• संवाददाता

मुलायम के गढ़ में 'अपनों' की बगावत ने समाजवादी पार्टी को चिंता में डाला


आगरा रविवार को जब मुख्य निर्वाचन आयुक्त सुनील अरोड़ा लोकसभा चुनाव की तारीखें घोषित कर रहे थे, उससे कुछ घंटे पहले दिल्ली से करीब 250 किलोमीटर दूर मैनपुरी में घटनाक्रम असामान्य रूप से बदल रहा था। यादव परिवार के इस सबसे बड़े गढ़ से समाजवादी पार्टी (एसपी) के संरक्षक मुलायम सिंह यादव लोकसभा चुनाव लड़ने जा रहे हैं। असामान्य इसलिए क्योंकि एसपी के प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम ने मुलायम के चुनावी अभियान में उतरने से पहले यहां की 51 सदस्यीय जिला कार्यकारिणी को भंग कर दिया। बताया जा रहा है कि वर्तमान सांसद और मुलायम परिवार के सदस्य तेज प्रताप सिंह यादव (मुलायम के पोते) को इस बार यहां से एसपी का टिकट नहीं मिलने से पार्टी का एक बड़ा तबका असंतुष्ट है। कार्यकारिणी भंग करने को इस बगावत को ठंडा करने के कदम के रूप में देखा जा रहा है। विरोध का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि प्रदर्शन के दौरान तेज प्रताप के कथित समर्थकों के एक समूह ने पार्टी के महासचिव राम गोपाल यादव का पुतला भी फूंका। वैसे एसपी के लिए विरोध प्रदर्शन कोई नई बात नहीं है। 2016 से ही पार्टी में अंदरूनी कलह की वजह से ऐसी तस्वीरें अकसर सामने आती रही हैं। लेकिन शायद ही किसी ने सोचा हो कि पार्टी के संरक्षक मुलायम के संसदीय क्षेत्र में भी ऐसा हो सकता है। हालांकि तेज प्रताप ने कहा है कि उन्हें पड़ोस की किसी सीट से टिकट मिलने की उम्मीद है लेकिन वह अपने समर्थकों को सड़क पर उतरने से नहीं रोक सके। 2014 के लोकसभा चुनाव में जब सभी पार्टियों का मोदी लहर में सफाया हो गया था, तब भी यादव बेल्ट के मैनपुरी, फिरोजाबाद, इटावा, बदायूं, कन्नौज और संभल जैसे इलाकों में एसपी ने अच्छा प्रदर्शन किया था। पार्टी ने सेंट्रल यूपी की चार लोकसभा सीटों (मैनपुरी, फिरोजाबाद, कन्नौज और बदायूं) पर जीत हासिल की थी, जहां से यादव परिवार के सदस्य चुनाव मैदान में उतरे थे। लेकिन इस बार अपने ही गढ़ में यादव कुनबे की कलह सामने आ रही है। पिछले तीन साल से यादव फैमिली में चल रही अनबन से पार्टी अब टूट चुकी है। मुलायम के नाराज छोटे भाई शिवपाल यादव ने प्रगतिशील समाजवादी पार्टी लोहिया (PSPL)नाम से नई पार्टी बनाकर अखिलेश की अगुआई वाली एसपी के खिलाफ जंग छेड़ दी है। शिवपाल ने ऐलान किया है कि उनकी पार्टी सभी 80 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। ऐसे में यादव बेल्ट में वह अपनी पुरानी पार्टी को काफी नुकसान पहुंचा सकते हैं। शिवपाल खुद रामगोपाल यादव के पुत्र अक्षय यादव के खिलाफ फिरोजाबाद से चुनाव लड़ रहे हैं। नेताजी (मुलायम सिंह) के खिलाफ वह कोई उम्मीवार नहीं उतारेंगे। हालांकि ऐसे संकेत हैं कि परिवार के अन्य सदस्यों को वह आसानी से जीतने नहीं देंगे। बदायूं में धर्मेंद्र यादव और कन्नौज में डिंपल यादव के खिलाफ भी वह अपने कैंडिडेट खड़े करेंगे। अखिलेश और तेज प्रताप का नाम एसपी की अगली लिस्ट में शामिल हो सकता है। परिवार के गढ़ की एक और लोकसभा सीट इटावा में शिवपाल का उम्मीदवार होने से एसपी कैंडिडेट कमलेश कठेरिया के लिए कठिन लड़ाई होगी। फिरोजाबाद में शिवपाल को मुलायम के खास और सिरसागंज से एसपी विधायक हरिओम यादव का समर्थन मिलता दिख रहा है। एक पूर्व स्थानीय विधायक मोहम्मद अजीम भी उनके साथ हैं। ऐसे में अक्षय यादव के लिए चुनावी चक्रव्यूह तैयार है, जिनका बतौर सांसद पिछले पांच साल के दौरान कोई खास असर नहीं नजर आया है। बदायूं में मुलायम के भतीजे धर्मेंद्र यादव शिवपाल की रणनीति की काट निकालने में जुटे हैं। एसपी के गठन के बाद से ही सक्रिय शिवपाल को यहां पार्टी कार्यकर्ताओं का अच्छा समर्थन हासिल है। चार बार के सांसद सलीम शेरवानी को उतारकर कांग्रेस ने धर्मेंद्र की मुश्किल बढ़ा दी है। 2009 के लोकसभा चुनाव में तीसरे नंबर पर रहने के बावजूद शेरवानी ने करीब दो लाख वोट हासिल किए थे और जाहिर है कि वह धर्मेंद्र के मुस्लिम वोटों में सेंध लगाएंगे। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अखिलेश को एक नेता के रूप में नाकाम साबित करने के उद्देश्य से शिवपाल ने सभी 80 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला लिया है। इस बेल्ट में अपने प्रभाव की वजह से वह अखिलेश को नुकसान पहुंचा भी सकते हैं। एक स्थानीय नेता शिवपाल के प्लान पर कहते हैं, 'हम तो डूबे हैं सनम तुम्हें भी ले डूबेंगे।' अभी यह भी देखना बाकी है कि जमीन पर एसपी-बीएसपी का गठबंधन किस तरह काम करता है। पार्टी सदस्यों का एक तबका गठबंधन से खुश नहीं है। यादव परिवार के पुश्तैनी गांव सैफई में वरिष्ठ एसपी नेता कहते हैं कि बीएसपी के साथ गठबंधन केवल दो नेताओं का समझौता है और जमीनी कार्यकर्ताओं का इस पर असर नहीं है। एसपी के जिन नेताओं को टिकट नहीं मिला है वे बीजेपी और शिवपाल यादव के पीएसपीएल में अपना भविष्य खोज रहे हैं। सैफई की फिजाओं में एक दिलचस्प नारा गूंज रहा है, 'सैंतीस पर लाल (अखिलेश), बाकी पर शिवपाल।' ऐसे में अखिलेश और मायावती के लिए सबसे अच्छी स्थिति होगी कि यह नारा हकीकत में न तब्दील होने पाए।