लोकसभा चुनाव: कौन बनेगा वेस्ट यूपी की इन चार सीटों का 'चौधरी'?

मेरठ 
लोकसभा चुनाव का औपचारिक ऐलान होते ही वेस्ट यूपी का राजनीतिक माहौल गरमा गया है। हर तरफ चुनाव की ही चर्चा है। इस बार का चुनाव कई मायनों में अहम है। मुजफ्फरनगर समेत वेस्ट यूपी की कई सीटों पर इस बार मुकाबला दिलचस्प होने जा रहा है। इनमें से चार अहम सीटों पर जहां पहले चरण में 11 अप्रैल को चुनाव होंगे। ये चार सीटें मुजफ्फरनगर, मेरठ, बागपत और सहारनपुर हैं। मुजफ्फरनगर सीट पर समाजवादी पार्टी (एसपी), बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) और राष्ट्रीय लोकदल (आरएलडी) गठबंधन की तरफ से चौधरी अजित सिंह चुनाव मैदान में हैं। यहां बीजेपी और कांग्रेस ने अपना उम्मीदवार घोषित नहीं किया है। यह चुनाव अजित सिंह की चौधराहट की असली परीक्षा लेगा। मुजफ्फरनगर दंगों के बाद आरएलडी का वोटबैंक पूरी तरफ से बिखर चुका है। वर्ष 2013 में दंगे के बाद ध्रुवीकरण और मोदी लहर में बीजेपी ने साल 2014 के लोकसभा चुनाव में यह सीट 4,01,135 मतों से जीती थी। अभी आरएलडी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। अगर गठबंधन यह सीट निकाल लेता है तो यह चौधरी परिवार की राजनीति के लिए संजीवनी का काम करेगी। इस लिहाज से इस सीट पर पूरे देश की नजर रहेगी। कांग्रेस के यूपी उपाध्यक्ष इमरान मसूद एक बार फिर यहां से चुनावी मैदान में हैं। पिछली बार बीजेपी ने उन्हें बहुत ही कम मार्जिन से चुनाव में पटकनी दी थी। इस बार का चुनाव इमरान की साख को साबित करने के लिए अहम है। इस बार चुनावी मुकाबला त्रिकोणीय बनने के आसार लग रहे हैं। गठबंधन की तरफ से हाजी फजलुर्रहमान को प्रत्याशी बनाया गया है। जातीय समीकरणों पर गौर करें तो सहारनपुर लोकसभा सीट पर करीब छह लाख मुस्लिम मतदाता हैं। कांग्रेस और गठबंधन की तरफ से भी मुस्लिम प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतरने से मुकाबला दिलचस्प हो गया है। मुस्लिम मतों में विभाजन हो गया तो बीजेपी को फायदा हो सकता है। अगर मुस्लिम मतों को अपने पाले में इमरान बनाए रख पाने में कामयाब होते हैं तो उनकी जीत का रास्ता आसान हो सकता है। इमरान के पक्ष में यह बात भी है कि काजी रशीद मसूद और इमरान के बीच राजनीतिक तल्खियां दूर हो गई हैं। इमरान का साथ काजी रशीद मसूद और उनके बेटे शाजान मसूद देंगे। काजी परिवार की एकता से चुनावी समीकरणों में बदलाव के संकेत देखे जा रहे हैं। जाटों का गढ़ माने जाने वाले बागपत में आरएलडी को बड़ा झटका तब लगा, जब पिछले लोकसभा चुनाव में पार्टी प्रमुख अजित सिंह को यहां से हार का सामना करना पड़ा। बीजेपी के सत्यपाल सिंह ने इस सीट से 2 लाख से अधिक वोटों से जीत दर्ज की। इस बार इस सीट पर पूरे देश की नजर रहेगी। यहां से गठबंधन के उम्मीदवार के तौर पर जयंत चौधरी मैदान में हो सकते हैं। माना जा रहा है कि बीजेपी यहां से एक बार फिर सत्यपाल सिंह को मौका दे सकती है। गठबंधन के लिहाज से देखें तो बीजेपी के सामने इस बार कड़ी चुनौती होगी। जयंत चौधरी के दादा पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह यहां से 1977, 1980 और 1984 में लगातार चुनाव जीते हैं। जयंत के पिता और आरएलडी अध्यक्ष अजित सिंह 6 बार 1989, 1991, 1996, 1999, 2004 और 2009 में बागपत से सांसद रहे। महाभारत के समय भारत की राजनीति का केंद्र रहा हस्तिनापुर आज मेरठ के नाम से जाना जाता है। वेस्ट यूपी की राजधानी के तौर पर मेरठ की अपनी पहचान है। यहां के राजनीतिक समीकरण आसपास की सीटों को भी प्रभवित करते हैं। मेरठ लोकसभा सीट राजनीतिक संदेश के हिसाब से अहम सीट मानी जाती है। पिछले दो दशकों से यह सीट बीजेपी का गढ़ मानी जाती रही है। बीजेपी के राजेंद्र अग्रवाल यहां से लगातार दो बार सांसद चुने जा चुके हैं। इस बार बीजेपी किसे मैदान में उतारेगी इसे लेकर तमाम तरह की चर्चाएं चल रही हैं। बीएसपी यहां से विवादित छवि वाले हाजी याकूब कुरैशी को चुनाव लड़ा सकती है। सूत्र बता रहे हैं कि कांग्रेस यहां से किसी फिल्म स्टार को मैदान में उतार सकती है। गठबंधन की वजह से यहां बीजेपी को मुश्किल आ सकती है। 

खास बातें : 
35 लाख के करीब है मेरठ की आबादी 
कुल वोटरों की संख्या- 1964388 
55.09 फीसदी पुरुष 
44.91 फीसदी महिला वोटर हैं 
5 विधानसभा क्षेत्र किठौर, मेरठ कैंट, मेरठ शहर, मेरठ दक्षिण और हापुड़। 

 

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