सरकार का नया सिरदर्द आपकी रसोई का बिल है ?

नई दिल्ली 
क्या आपको लगता है कि चुनाव से पहले महंगाई का कम होना किसी सरकार के लिए अच्छी खबर हो सकती है? अगर आप सोच रहे हैं- हां, तो आप गलत हैं। महंगाई में तय स्तर से ज्यादा की गिरावट को अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा संकेत नहीं माना जाता। ब्लूमबर्ग में छपी एक खबर के मुताबिक, खाद्य उत्पादों के (तय स्तर से) कम दाम मोदी सरकार की मुश्किलें बढ़ा सकते हैं। दरअसल मोदी सरकार ने किसानों से 2022 तक उनकी आय को दोगुना करने का वादा किया है। मगर सवाल यह है कि जब महंगाई में गिरावट की वजह से किसानों को अपनी फसल कम दाम पर बेचनी पड़ेगी तो यह लक्ष्य कैसे हासिल होगा?  इस मामले पर स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में मुख्य आर्थिक सलाहकार सौम्य घोष के कहा, 'भारत में खाद्य पदार्थों के गिरते दाम मोदी (सरकार) के लिए परेशानी का सबब बन सकते हैं। ज्यादा उत्पादन की वजह से खाद्य पदार्थों के दाम में हुई गिरावट के प्रभाव से किसानों को बचाने के लिए की जाने वाली भरपाई सरकार का बोझ बढ़ाएगी।' खास बात यह है कि किसानों को दी जाने वाली मदद के साथ-साथ सरकार को राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को भी ध्यान में रखना है। ऐसे में केंद्र सरकार पर कितना बोझ पड़ेगा, यह इस पर निर्भर करता है कि राज्य सरकारें किसानों के सहयोग के लिए कौनसा तरीका अपनाती हैं। बता दें कि केंद्र सरकार ने सितंबर में तीन तरीकों को मंजूरी दी थी, जिनसे किसानों को सोयाबीन, सरसों और दलहन की फसलों की लागत के आधार पर 50 फीसदी मुनाफा मिल सके। प्राइस-सपॉर्ट प्लान के तहत सरकारी एजेंसियां राज्य सरकारों की मदद से दलहन, तिलहन और कोपरा को खरीदेंगी। इस खरीद में खर्चे और नुकसान की भरपाई केंद्र सरकार करेगी। दूसरा तरीका भावांतर के भुगतान का है, इसे तिलहन की फसलों के लिए प्रस्तावित किया गया है। इसके तहत किसानों को फसलों की न्यूनतम कीमत और बाजार से मिलने वाली कीमत के अंतर का भुगतान किया जाएगा। निजी कंपनियों को भी कुछ फसलों को खरीदने की अनुमति होगी। इसके अलावा धान, गेहूं और कपास सहित कुछ अन्य फसलों की खरीद के लिए सरकार के पहले के तरीके जारी रहेंगे। 

 

Share on Facebook
Share on Twitter
Please reload

                                           KarmKasauti

                            Kanpur Uttar Pradesh

          Email: karmkasauti@gmail.com

   Copyright 2018. All Rights Reserved.