• संवाददाता, दिल्ली

7 रोहिंग्याओं को वापस म्यांमार भेजा गया, सुप्रीम कोर्ट ने दखल से किया था इनकार


नई दिल्ली 7 रोहिंग्या मुसलमानों को गुरुवार को मणिपुर के मोरेह बॉर्डर से वापिस म्यांमार भेज दिया गया। सीनियर वकील प्रशांत भूषण के इस मामले में सुप्रीम कोर्ट से दखल देने की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट के इससे इनकार करने के कुछ घंटे बाद ही 7 रोहिंग्याओं को भारत से बाहर भेजा गया। भूषण ने दलील दी थी कि म्यांमार में इन्हें उत्पीड़न का सामना करना पड़ सकता है। जिन रोहिंग्याओं को म्यांमार की अथॉरिटी को मोरेह बॉर्डर पर सौंपा गया है उनकी पहचान मोहम्मद जमाल, मुकबुल खान, साबिर अहमद, मो. सलाम, जमाल हुसैन, मो. रहिमुद्दीन और मोहम्मद युनुस के तौर पर हुई है। म्यामांर द्वारा इन सभी की पहचान वहां के निवासी के तौर पर की गई है। म्यांमार सरकार ने अगस्त 2018 में सात रोहिंग्याओं को एक बार यात्रा के लिए दस्तावेज के रूप में उनके निर्वासन को सक्षम करने और म्यांमार लौटने के लिए 'पहचान प्रमाणपत्र' जारी किया था। असम पुलिस ने बुधवार सुबह उन सातों को उनके जरूरी दस्तावेजों के साथ सिलचर डिटेंशन सेंटर से मोरेह बॉर्डर पहुंचाया। जब सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दखल देने से इनकार कर दिया तो इन्हें म्यामांर अथॉरिटी को सौंप दिया गया। बता दें कि प्रशांत भूषण ने इस मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि सुप्रीम कोर्ट को रोहिंग्याओं के जीवन के अधिकार की रक्षा करने की अपनी जिम्मेदारी का अहसास होना चाहिए। इसपर चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा कि हमें अपनी जिम्मेदारी पता है और किसी को इसे याद दिलाने की जरूरत नहीं। प्रशांत भूषण की याचिका पर चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली बेंच ने सुनवाई की। केंद्र सरकार ने बेंच को बताया कि ये 7 रोहिंग्या 2012 में भारत में घुसे थे और इन्हें फॉरेन ऐक्ट के तहत दोषी पाया गया था।

केंद्र की तरफ से अडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) तुषार मेहता ने कहा कि म्यांमार ने इन रोहिंग्याओं को अपना नागरिक मान लिया है। साथ ही वह उन्हें वापस लेने के लिए भी तैयार है। एएसजी ने कहा कि ऐसे में कोई वजह नहीं है कि इन रोहिंग्याओं को उनके देश जाने से रोका जाए। सुनवाई के दौरान प्रशांत भूषण ने कहा कि रोहिंग्याओं को जबरन वापस भेजा जा रहा है।

प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट से दरख्वास्त करते हुए कहा कि वह संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHCR) के अधिकारों को रोहिंग्याओं की इच्छा जानने को कहे। भूषण ने कहा इससे यह पता लगाया जाए कि क्या रोहिंग्या वहां जाएंगें जहां उनका भयानक नरसंहार हुआ था। हालांकि चीफ जस्टिस गोगोई की बेंच ने उनकी इस याचिका को खारिज कर दिया।

याचिका खारिज होने के बाद प्रशांत भूषण ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट को रोहिंग्याओं के जीवन के अधिकार की रक्षा करने के लिए अपनी जिम्मेदारी का अहसास होना चाहिए। इसपर चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा कि हम हम जीवन के अधिकार के संबंध में अपनी जिम्मेदारी से पूरी तरह से अवगत हैं और किसी को इसे याद दिलाने की जरूरत नहीं।