• संवाददाता

आखिर बॉर्डर पास दर्शन के लिए दूरबीन का इस्तेमाल क्यों कर रहे हैं भारतीय सिख?


चंडीगढ़ पंजाब के गुरदासपुर जिले में अंतर्राष्ट्रीय सीमा के नजदीक स्थित दर्शन स्थल पर आम दिनों की अपेक्षा इस समय हलचल बढ़ गई है। यहां देश भर से सिखों समुदाय के लोग बड़ी संख्या में गुरदासपुर का रुख कर रहे हैं। दरअसल ये सभी सिखों के पवित्र तीर्थस्थान करतारपुर साहिब की दूरबीन से एक झलक के लिए लगातार आ रहे हैं जो पाकिस्तान के नारोवल जिले में रवि नदी के उस पार स्थित है। एक बार फिर इस मुद्दे पर राजनीतिक चर्चा शुरू हो गई है।

पिछले महीने ही पंजाब के मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान के शपथग्रहण समारोह से लौटे थे तो उन्होंने बयान दिया था कि पाकिस्तान आर्मी चीफ जनरल कमर जावेद बाजवा ने अगले साल गुरुनानक देव की 550 जयंती के मौके पर डेरा बाबा नानक से गुरुद्वारा करतारपुर साहिब का मार्ग खोलने का वादा किया है। इसी के बाद से यहां दर्शन करने आने वाले लोगों की संख्या बढ़ी है। इसके बाद पिछले हफ्ते पाकिस्तान के सूचना मंत्री फवाद अहमद चौधरी ने भी कहा कि इमरान खान सरकार भारतीय सिख तीर्थयात्रियों के लिए करतारपुर साहिब के लिए वीजा फ्री डायरेक्ट एक्सेस की अनुमति के बारे में विचार कर रही है।

इसके बाद भारतीय सिखों की उम्मीद और बढ़ गई है। फिलहाल अभी तो तीर्थयात्रियों के लिए दर्शन बिंदु से अपने पवित्र तीर्थस्थान की एक झलक ही सब कुछ है। जिस दिन आसमान साफ होता है तो भक्त दर्शन स्थल से करतारपुर साहिब की सफेद रंग की इमारत और गुंबद को देख पाते हैं। इसे बीएसएफ ने तैयार किया है जो, बॉर्डर सीमा से कुछ ही दूर पर स्थित है। लेकिन पिछले कुछ समय से पाकिस्तान की तरफ नेपियर घास अधिक उगने की वजह यह अद्भुत दृश्य ओझल हो गया है इसलिए इसके लिए दूरबीन की व्यवस्था की गई है। दर्शन स्थल पर यह दूरबीन लोहे के केस में लगाई गई है जिससे अब करतारपुर साहिब के दर्शन का दृश्य और स्पष्ट हो गया है। गुरुद्वारे को देखकर भक्त प्रार्थना करते हैं और झुककर नमन करते हैं।

क्यों खास है करतारपुर साहिब? सिख इतिहास के अनुसार, अपनी प्रसिद्ध चार यात्राओं को पूरी करने के बाद गुरुनानक देव 1522 में करतारपुर साहिब में ही रहने लगे थे जहां उन्होंने अपने जीवन के अंतिम 17 वर्ष बिताए। उनकी मृत्यु के बाद यहां गुरुद्वारे का निर्माण करा दिया गया। पटियाला की श्रद्धालु बलजिंदर कौर कहती हैं, 'हर सिख पाकिस्तान में नानकाना साहिब और दूसरे गुरुद्वारों में बिना बाधा प्रवेश की प्रार्थना करता है। उम्मीद है कि हमारी प्रार्थना जल्द ही स्वीकार होगी।'

ऑस्ट्रिया के साल्जबर्ग स्थित गुरुद्वारा गुरु अंगद देव जी के उपाध्यक्ष जगतार सिंह कहते हैं कि वह पिछले 11 वर्षों से डेरा के दर्शन के लिए आते रहे हैं। वह आगे कहते हैं, 'भारत और पाकिस्तान के बीच सौहार्दपूर्ण संबंध के लिए यह कॉरिडोर मील का पत्थर साबित होगा।' हालांकि न ही पाकिस्तान और न ही भारत की तरफ से इसको लेकर फिलहाल कोई आधिकारिक घोषणा हुई है। लेकिन भारतीय उच्च आयुक्त अजय बिसारिया के हाल ही में करतारपुर साहिब के दौरे को इस मामले में महत्वपूर्ण विकास के रूप में देखा जा रहा है।

1999 में परवेज मुशर्रफ ने की थी पहल पाकिस्तान की पूर्व की सरकार ने अजय को दो मौकों पर रावलपिंडी के पास स्थित गुरुद्वारा पंजा साहिब में प्रवेश के लिए रोका था। इससे पहले भी कई वर्षों से इस मुद्दे को आगे बढ़ाने के लिए प्रस्ताव और पहल किए गए। 1999 में पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने बिना पासपोर्ट-वीजा के भारतीय सिखों को डेरा बाबा नानक से करतारपुर साहिब आने की अनुमति देने का प्रस्ताव दिया था।

एक दशक बाद एक अक्टूबर 2010 को पंजाब विधानसभा में केंद्र सरकार से पाकिस्तान सरकार के साथ कॉरिडोर मुद्दे पर बातचीत के लिए पूछते हुए एक प्रस्ताव पारित किया था। यहां तक कि गुरदासपुर से राज्यसभा सासंद परताप सिंह बाजवा पाकिस्तान में करतारपुर साहिब जमीन को गुरदासपुर जिले की निर्जन जमीन के साथ अदला-बदली का विचार लेकर भी आए थे।

यूएस में तैयार की गई थी रिपोर्ट इसका एक उदाहरण बंटवारे के दौरान का है जब हुसैनीवाला के राष्ट्रीय शहीद मेमोरियल को वापस भारत में लाने के लिए पंजाब के फाजिल्का जिले में सुलेमंकी के पास स्थित 12 गांवों की पाकिस्तान के साथ अदला-बदली की गई थी , जहां भगत सिंह और अन्य शहीद स्वतंत्रता सेनानियों के स्मारक बने हुए हैं।

2010 में यूएस स्थित मल्टी ट्रैक कूटनीति संस्थान ने करतारपुर मार्ग को तैयार करने के लिए एक रिपोर्ट बनाकर वाशिंगटन डीसी में भारतीय और पाकिस्तानी राजदूतों को सौंपी थी। इस रिपोर्ट में कहा गया था कि मार्ग निर्माण के लिए भारत को 106 करोड़ और पाकिस्तान को 16 करोड़ रुपये का खर्च आएगा।

'हम भारतीयों के स्वागत के इंतजार में' इस दौरान शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी ने दोनों सरकारों के राजी होने होने पर कॉरिडोर बनाने का प्रस्ताव दिया है। इसके अध्यक्ष गोबिंद सिंह लोंगोवल ने कहा, 'हम इस संवेदनशील धार्मिक मुद्दे पर कोई राजनीति नहीं करना चाहते हैं।' करतारपुर साहिब के ग्रंथी गोबिंद सिंह कहते हैं, 'हम भारतीय सिखों का खुले दिल के स्वागत करने के लिए इंतजार कर रहे हैं। जब परवेज मुशर्रफ ने कॉरिडोर बनाने का ऑफर दिया था तो हमें बेहद खुशी हुई थी और हमने रवि नदी पर प्रतीकात्मक रूप से एक कच्चा पथ भी बनाया था। दुर्भाग्यवश, इसके बाद कुछ नहीं हुआ। जबसे हमारे आर्मी चीफ ने दोबारा से ऑफर दिया है, यहां भक्तों और सरकारी अधिकारियों की संख्या बढ़ गई है।'