मन ये तेरा 

परेशान क्यूँ है,

इस जग से 

बेफिक्र क्यूँ है,

नित नये ख्वाब 

सजा कर 

मन में दबा 

बैठा क्यूँ है।

पथ पर नित 

आगे बढ चल

न चंद कांटो से 

तू डर,

मुसीबतों को चीर

 तू देख,

बिन अंधकार 

चमकता सितारा 

भी नही है।

 

ए मुसाफिर

तूँ रूकता क्यूँ है। 

तू रूकता क्यूँ है।

 

शालू मिश्रा, नोहर (हनुमानगढ) राजस्थान

 

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