• लेखिका वन्दिता मिश्रा

डिजिटल संसार या संहार


अपर्याप्त विनियमन के कारण,100 बिलियन डॉलर कैश और 900 बिलियन डॉलर की कीमत वाली कंपनी गूगल तकनीकी जगत की महारथी होने के साथ साथ वो आर्थिक दैत्य बन गयी है जिसके,जिंदा रहने और मरने दोनों ही स्थिति में वैश्विक आर्थिक संकट की स्थिति बन रही है। निःसंदेह गूगल एक शानदार अविष्कार एक क्रांतिकारी उत्पाद अति आवश्यक जरूरत है.दिन प्रतिदिन के जीवन मे गूगल हमारा बहुत ही विश्वसनीय साथी है.चाहे वो ज्ञान के प्रसार का क्षेत्र हो चाहे सस्ती और फ्री डिजिटल सुविधाओं का उपयोग,गूगल में हम और हममें गूगल रच बस गया है।जहाँ बिना किसी भेदभाव के गूगल सर्च, पल भर में हमे दुनिया की कोई भी जानकारी दे सकता है वहीँ गूगल मैप हमें हमारी वास्तविक और अन्य जगहों की जहां हम जाना चाहें,उसकी सटीक लोकेशन बता सकता है।चूंकि हम सभी तकनीकी रूप से उतने उत्कृष्ट नहीं कि हम ये जान सकें कि इतनी सारी सुविधाएं गूगल हमें फ्री क्यों दे रहा है?क्या हम सोचते है की ये सिर्फ एक खास बिज़नेस मॉडल है ? या ये गूगल हमसे बहुत कुछ छीन भी रहा है?अगर छीन रहा है तो क्या ?

क्या हमें आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस के बारे में समझ है?क्या हमें इस बात की समझ है कि आर्टिफीशियल इंटेलीजेंस की फील्ड का सबसे बड़ा महारथी गूगल है ? क्या हम जानते हैं कि कैसे यह नया क्षेत्र जो करोड़ों द्वारा सुना भी नहीं गया हमें और हमारी आने वाली पीढ़ियों को कैसे प्रभावित करेगा?यदि इन सभी प्रश्नों के उत्तर “हाँ” में हैं तब हमें ये बताने की जरुरत है कि हम सतर्क कितने हैं.यदि इन सभी प्रश्नों के उत्तर “ना” में हैं और तब भी हम न तो कोई एक्शन लेते हैं और न ही कोई प्रश्न पूछते हैं.जो “फ्री”मिला उसे इस्तेमाल कर लिया बस! ऐसे में हमारी स्थिति उस “योद्धा” शुतुरमुर्ग की तरह है जो सभी समस्याओं से लड़ने के लिए अपना सर रेगिस्तान की रेत में छिपा लेता है और मान लेता है कि समस्या अपने आप चली जाएगी.

वास्तविकता ये है कि समस्या कहीं जा नहीं रही है बल्कि ये हमारे और भी करीब व्यक्तिगत जीवन और समाज के हर तबके में पैठ बनाती जा रही है,गूगल जैसी विशाल कम्पनियाँ छोटी कम्पनियों को खाती जा रही हैं,यह “प्रतियोगिता”को खत्म करने की नीति है जो समाज में नए अवसरों को समाप्त कर ”मोनोपोली” को जन्म देती है.हाल में इसके कई उदाहरण देखे गए हैं.

यूरोपियन यूनियन के एंटीट्रस्ट विभाग ने (एंटीट्रस्ट विभाग,भारत के भारतीय प्रतियोगिता कमीशन का ही समानार्थी है,जोकि कंपनियों के बीच स्वस्थ प्रतियोगिता पर बल देता है) नवम्बर 2010 में गूगल के खिलाफ पहली जांच शुरू की गयी थी, मामला था गूगल द्वारा अपनी प्रभावशाली स्थिति का अनावश्यक लाभ उठाने का.ये प्रभावशाली स्थिति गूगल ने अपने ओपेन सोर्स (अर्थात मुफ्त में उपलब्ध) ऑपरेटिंग सिस्टम एंड्राइड के माध्यम से बनायी थी.गूगल के नकारात्मक प्रभावशालिता पर एक और जांच यूरोपियन कमीशन ने 2013 में बिठाई और 2014 में यूरोपियन संसद ने बहुमत से वोट करते हुए गूगल को दो भागों में विभाजित करने तक की पैरवी कर डाली. 2017 में यूरोपियन यूनियन ने गूगल पर 2.42 बिलियन यूरो का जुर्माना लगाया था.कारण यह था की गूगल अपने सर्च प्लेटफार्म में हर क्षेत्र की अपनी ही सेवाओं को प्राथमिकता से दर्शा रहा था, अर्थात उदाहरण के तौर पर-यदि आप सोशल मीडिया प्लेटफार्म सर्च करें,वीडियो कालिंग सर्च करें या नए मेल आई डी के निर्माण के लिए सर्च करें तो क्रमशः गूगल प्लस,गूगल हैन्गाउट्स व जीमेल ही पहले सर्च रिजल्ट्स में आएगा;जबकि सर्च रिजल्ट्स की मैकेनिज्म ये नहीं है.सर्च के परिणाम कई फैक्टर्स पर निर्भर करते हैं,जैसे किस बात पर ऑनलाइन चर्चा अधिक हो रही है,कौनसा प्रोडक्ट या सेवा ज्यादा इस्तेमाल में है,इसके आलावा भी कई अन्य फैक्टर्स हैं,पर यूरोपियन यूनियन का आरोप था और वो अंत में सही भी साबित हुआ कि गूगल अपने मालिकाना हक का अवांछित इस्तेमाल कर रहा है जो कि एंटीट्रस्ट कानूनों के खिलाफ है.अभी कुछ दिनों पहले ही यूरोपियन कमीशन ने फिर से 5 बिलियन डॉलर का जुर्माना गूगल पर लगाया है. इस बार आरोप और भी ज्यादा गंभीर हैं.आरोप ये है कि गूगल विभिन्न एंड्राइड डिवाइस बनाने वाली कंपनियों पर 2 प्रमुख बाध्यताएं आरोपित करता है.


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