• लेखक पंकज कुमार मिश्रा

आर्टिकल- एकीकृत कश्मीर


अलगाववादी संगठनो और कुछ स्थानीय मुस्लिम नेताओं ने कश्मीर के वादीयों में हमेशा से जहर घोला है , इतिहास गवाह है कि आई एस आई जैस ए मोहम्मद और अल कायदा जैसे आतंकी संगठनो ने कश्मीर का जमकर फायदा उठाया है । कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है पर कुछ भारतीय मुस्लिम इसे क्षेत्रिय विवाद कहकर कश्मीर मे अलगाववादीयों को शय देते है । सैफूद्दीन सोज और मुफ्ती महबुबा जैसी शख्सीयते भी अलगाववादीयों के साथ सुर मे सुर मिलाते नजर आये , पर आवाम आज भी एक सुर मे भारत माता की जय पर अडिग है । राजग से अलग होने के बाद पी डी पी ने जो बयानबाजी कश्मीर मे शुरू की है वो वादी के हालात को और खुश्क कर देगी ।कश्मीर मसला भारत के लिए अहम मुद्दा माना जाता है जिसके बल पर हम भारतीय आज अपने पड़ोसी देशो पर अपना दबदबा बनाने में कामयाब रहे है । अपने देश में कश्मीर में सक्रिय आतंकियों और उनके पक्ष में खड़े पत्थरबाजों के समर्थकों की कमी नहीं है। उनकी नज़र में वे लोग भारतीय सेना के सताए हुए लोग हैं। वैसे तो यह दुष्प्रचार आमतौर पर भारतीय सेना को कलंकित कर उसे घाटी से हटाने की पाकिस्तानी साज़िश का हिस्सा ही है, लेकिन इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि बेहद तनावपूर्ण और कठिन परिस्थितियों में सेना के कुछ जवानों से ज्यादतियां भी ज़रूर हुई होंगी। ऐसा हुआ है तो उसका प्रतिकार ज़रूरी है और इस प्रतिकार में पूरे देश को कश्मीरी लोगों का साथ देना चाहिए। लेकिन इस बहाने किसी को भी हाथ में पाकिस्तान और आई.एस के झंडे लेकर देश से युद्ध छेड़ने की इजाज़त नहीं दी जा सकती। देश के हर भाग में व्यवस्था और पुलिस द्वारा हर रोज़ अनगिनत निर्दोष लोगों की गिरफ्तारियां भी होती हैं, नकली मुठभेड़ में युवाओं की हत्याएं भी होती हैं और कहीं-कहीं स्त्रियों के साथ बलात्कार भी। क्या उनसबको हाथों में हथियार लेकर अपने लिए अलग देश की मांगशुरू कर देनी चाहिए ? अगर आपके भीतर कश्मीरी अलगाववादियों के लिए दर्द उठता है है तो आपको एक बार कश्मीरी पंडितों को याद ज़रूर कर लेना चाहिए। ये वो लोग हैं जिनकी ज़मीनें छिन गईं। घर छिन गए। जड़ें छिन गईं। उनके सैकड़ों लोगों की हत्याएं हुईं। उनकी स्त्रियों से बलात्कार हुए। पिछले सताईस सालों से इसबिरादरी के लाखों लोग अपने ही देश के विभिन्न हिस्सों में विस्थापितों का जीवन जी रहे हैं। उन लाखों लोगों में से आज तक कोई एक भी अलगाववादी और आतंकवादी नहीं बना। किसी ने न अपने लिए अलग देश की मांग की, न हाथों में किसी दूसरे देश का झंडा थामा और न अपनी उपेक्षा के लिए पुलिस और सेना पर पत्थर फेंके।कश्मीर के दर्द गिनाने वालों को उनका दर्द महसूस नहीं होता। कांग्रेस ने तो कभी उनकी चिंता नहीं ही की, उन्हें वापस घाटी में बसाने के वादे करने वाली वर्तमान भाजपा सरकार ने भी उनके साथ छल किया। कश्मीर की समस्या पर बात करते वक़्त सरकारों को पाकिस्तान और कश्मीर के अलगाववादी तो नज़र आते हैं, विस्थापित कश्मीरी पंडित नहीं। इन तमाम व्यथाओं के बावज़ूद उन लोगों में अपने देश, अपनी मिट्टी के लिए मुहब्बत कम न हुई। वे लोग देश के जिस कोने में हों, आज भी अपनी जन्मभूमि, वहां के मंदिरों और दरगाहों पर सर झुकाने ज़रूर जाते है । समस्यायें जन्म ही लेती है खत्म होने के लिए । कुछ समस्याये नासुर बनी रहती है और कुछ खुद ब खुद ठंडा पड़ जाती है । ---- पंकज कुमार मिश्रा जौनपुरी