• डॉ.दीपकुमार शुक्ल

कैसे पूरा होगा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का लक्ष्य


मानव संसाधन विकास मन्त्री प्रकाश जावड़ेकर द्वारा छात्रों के बहुमुखी विकास के लिए 24 मई को समग्र शिक्षा योजना की शुरुआत की गयी। इस योजना के तहत प्राथमिक से बारहवीं कक्षा तक के छात्रों का किताबी ज्ञान के साथ-साथ कौशल विकास भी कराया जायेगा तथा उनके खेल और स्वास्थ्य पर भी नजर रखी जाएगी। इसे मानव संसाधन विकास मन्त्रालय का ऐतिहासिक कदम बताते हुए प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी की उस प्रतिबद्धता से जोड़ा जा रहा है जिसमें उन्होंने ‘सबको शिक्षा अच्छी शिक्षा’ का नारा दिया है। इस योजना को विद्यालयी शिक्षा की अवधारणा में महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। इसके मूल में सरकार का उद्देश्य आधुनिक तकनीक का प्रयोग करते हुए शिक्षा को गुणवत्तापूर्ण बनाना है। अब प्रश्न उठता है कि क्या इस योजना के वास्तव में वही परिणाम प्राप्त होंगे जिनकी अपेक्षा की जा रही है। या फिर व्यावहारिक धरातल पर इस योजना का भी वैसा ही हश्र होगा जैसा अब तक की अन्य योजनाओं का हुआ है। आकड़ों के हिसाब से तो सरकार सर्व शिक्षा अभियान को भी पूर्ण सफल मानती है। जिसकी शुरुआत आज से बीस वर्ष पूर्व अटल विहारी बाजपेयी की सरकार में हुई थी। सरकारी आकड़ों की माने तो आज देश के 14.5 लाख प्राथमिक विद्यालयों में 19.07 करोड़ बच्चे दाखिल हैं। आंकड़े हमें यह भी बताते हैं कि प्राथमिक स्तर पर 16 प्रतिशत तथा उच्च प्राथमिक स्तर पर 32 प्रतिशत विद्यार्थी विद्यालय में दाखिला लेने के बाद भी पढ़ने नही आते हैं। सवाल उठता है कि बदलते परिवेश में क्या आज भी लोग शिक्षा के प्रति जागरूक नहीं हैं या फिर शिक्षा की वर्तमान व्यवस्था से वे संतुष्ट नहीं है? जागरूकता का अभाव होता तो रिक्शा चालकों और मजदूरों के बच्चे कान्वेंट स्कूलों में मंहगी फीस देकर पढ़ाई न कर रहे होते। शहरी क्षेत्रों में उन्हीं घरों के बच्चे स्कूल नहीं जा पाते या बीच में पढाई छोड़ देते हैं जो निजी विद्यालयों की फीस दे पाने में सक्षम नहीं हैं। या फिर जिन गरीब बच्चों के माता-पिता इस दुनियाँ में नहीं हैं और यदि हैं भी तो बीमारी के कारण धनोपार्जन नहीं कर पाते। या फिर जिन बच्चों के पिता नशेबाज और लापरवाह होते हैं। ऐसे सभी बच्चों को अपने परिवार का खर्च चलाने के लिए पढ़ाई छोड़कर नौकरी करनी पड़ती है। शहरी क्षेत्रों में ऐसे बच्चों की संख्या का प्रतिशत गाँवों की अपेक्षा काफी अधिक है। ग्रामीण क्षेत्रों में अमीरों के बच्चे निजी स्कूलों में तो गरीबों के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के अनेक माता-पिता केवल बच्चों को शहर के निजी स्कूलों में पढ़ाने के लिए किराये का मकान लेकर शहर में निवास बनाये हुए हैं। उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि आम आदमी शिक्षा के प्रति आज न केवल जागरूक है बल्कि वह अपने बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा भी दिलाना चाहता है। लाख प्रयास के बावजूद भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के मामले में सरकारी विद्यालय आम आदमी का विश्वास हासिल नहीं कर पा रहे हैं। सरकारी स्कूलों का भवन उच्च कोटि का है, शिक्षा निशुल्क है, मुफ्त की पुस्तकें हैं, मुफ्त गणवेश है, उच्च शिक्षित और प्रशिक्षित अध्यापक हैं। फिर भी आम आदमी यहाँ अपने बच्चे नहीं पढ़ाना चाहता है। क्योंकि यहां अगर कुछ नहीं है तो वह है गुणवत्तापूर्ण शिक्षा। विद्रुप तो यह भी है सरकारी स्कूलों के अध्यापक भी अपने बच्चों को निजी स्कूलों में ही पढ़ाना चाहते हैं। गौर करने वाली बात यह है कि सरकारी विद्यालयों में जैसे-जैसे उच्च शिक्षित लोग शिक्षक बनते गए वैसे-वैसे शिक्षा की गुणवत्ता में कमी आती चली गयी। आज से पच्चीस वर्ष पूर्व तक प्राथमिक विद्यालयों और जूनियर हाईस्कूल के शिक्षक अधिकतम इण्टरमीडिएट तक ही शिक्षित होते थे। इसके और पहले के शिक्षक हाईस्कूल या मिडिल पास होते थे। लेकिन तब विद्यालयों में जमकर पढ़ाई होती थी। कई गावों के बीच एक विद्यालय होता था और आसपास के सभी गाँवो के बच्चे उसी स्कूल में पढ़ने जाते थे। केवल वही बच्चे स्कूल नहीं जाते थे जिनके माता-पिता शिक्षा के प्रति जागरूक नहीं होते थे। गाँव में जिस कक्षा तक स्कूल होता था उस कक्षा तक की शिक्षा गाँव में ही पूर्ण होती थी। गाँव छोड़कर आगे की पढ़ाई के लिए ही बच्चे शहर आते थे। जबकि आज गाँव का स्कूल छोड़कर लोग अपने बच्चों का दखिला शहर के निजी विद्यालयों में करवा रहे हैं। जो शहर आने में असमर्थ हैं वे भी गाँव के निजी विद्यालयों को ही प्राथमिकता दे रहे हैं। ऐसे में सरकारी स्कूलों के शैक्षणिक वातावरण को स्वतः ही समझा जा सकता है। निजी विद्यालयों में अधिकांशतया वही लोग शिक्षण कार्य करते हैं जो सरकारी शिक्षकों की प्रतिस्पर्धा में पिछड़ जाते हैं। अनेक निजी स्कूलों के शिक्षक तो स्नातक स्तर के विद्यार्थी ही होते हैं। तब फिर निजी स्कूलों की शिक्षा को अभिभावक गुणवत्तापूर्ण क्यों मानते हैं? सरकारी स्कूलों के शिक्षकों की योग्यता के वर्तमान मानक के अनुसार स्नातक उत्तीर्ण विद्यार्थी का मेरिट के आधार पर बीटीसी के लिए चयन होता है। उसके बाद वह बीटीसी की परीक्षा उत्तीर्ण करता है। फिर अध्यापक पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण करता है। नई व्यवस्था में अब उसे सहायक अध्यापक भर्ती परीक्षा भी उत्तीर्ण करनी है। इतने मानको को पार करके शिक्षक बनने वाले की योग्यता कुछ कम नहीं तो प्रशासनिक अधिकारी के बराबर होती है। ऐसे व्यक्ति की अपनी एक अलग सोच होती है। उसका एक अलग स्वप्न होता है। अच्छा वेतन और कम काम के चक्कर में लोग सरकारी शिक्षक तो बन जाते हैं पर सिर्फ नाम के। व्यावहारिक धरातल पर वे समर्पित शिक्षक न होकर सिर्फ नौकरी की खानापूरी तक ही सीमित रहते हैं। आज शिक्षा के प्रति जागरूकता भले ही बढ़ गयी हो परन्तु सबका उद्देश्य अच्छे वेतन और कम परिश्रम वाली नौकरी पाना मात्र ही है। अब कहीं यदि योग्यता के अहंकार में अफसरी का घालमेल हो जाये तो नाक बहाते बच्चों के साथ समय बिताना भला किसे अच्छा लगेगा? ग्रामीण अंचलों में तैनात 95 प्रतिशत शिक्षक अपना निवास शहरों में बनाये हुए हैं। जहाँ से वे निजी वाहनों द्वारा विद्यालय पहुँचते हैं। निकटवर्ती विद्यालयों के कई शिक्षक मिलकर किराये की कार कर लेते हैं। जो सुबह सबको नियत स्थान से लेकर उनके विद्यालय छोड़ती और उसी क्रम से वापस लाती है। जिससे सुबह-शाम भागमभाग मचती है। इस भागमभाग में अक्सर देर भी हो जाती है। सफर की थकावट फिर मिड-डे मील। उसके बाद घर वापसी की जल्दी। ऐसे में समर्पित भाव से शिक्षा देने की उम्मीद भला किससे की जा सकती है? दूर-दराज के गाँवों में कोई शिक्षक जाना नहीं चाहता है। जिनका स्थानान्तरण हो भी जाता है वे भ्रष्ट अधिकारियों से लेन-देन करके मुख्य मार्ग के निकट या तो स्थानान्तरण करवा लेते हैं या फिर अस्थायी समायोजन करवा लेते हैं। दूर-दराज के अनेक विद्यालयों में मात्र एक शिक्षक ही तैनात है। कहीं-कहीं तो शिक्षामित्रों के भरोसे ही विद्यालय चल रहे हैं। पहले गाँव के विद्यालयों में अधिकांशतया उसी गाँव का या निकटवर्ती गाँव का व्यक्ति शिक्षक होता था। जो कि विद्यालय समय के बाद भी अक्सर बच्चों की निगरानी करता रहता था। विद्यालय में अनुपस्थित रहने वाले या फिर पढ़ाई में कमजोर बच्चों के माता-पिता से मुलाकात कर लेता था। जिससे अभिभावक बहुत खुश होते थे और बच्चे उसका अनुशासन मानते थे। जबकि आज का परिवेश ही एकदम बदल गया है। शहरी क्षेत्रों में गली-गली खुले निजी विद्यालयों की भीड़ में सरकारी स्कूलों का अस्तित्व ही गायब होता दिखाई दे रहा है। निजी स्कूलों की अपनी अलग सोच है। उनका उद्देश्य समाज को शिक्षित करना न होकर धनोपार्जन मात्र ही है। इसलिए उनकी प्रत्येक नीति और रीति के केन्द्र में धन ही रहता है। जिससे मासूम बच्चों की पीठ पर बस्ते का बोझ बढ़ता जा रहा है। ऐसे में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लक्ष्य को प्राप्त कर पाना एकदम असम्भव जैसा ही लगता है। सरकार ‘सबको शिक्षा अच्छी शिक्षा’ के प्रति यदि वास्तव में कृत संकल्पित है तो उसे व्यावहारिक धरातल के सभी संभावित तथ्यों पर विचार करते हुए शिक्षा की नीति बनानी चाहिये। तभी समग्र शिक्षा का उद्देश्य सार्थक होगा। अन्यथा यह योजना भी वास्तविकता से दूर आकड़ों की बाजीगरी में ही उलझकर रह जाएगी।