जम्मू-कश्मीर में ऑपरेशन ऑलआउट का असर, आंतकियों की कम हो गई जीवनरेखा


नई दिल्ली सुरक्षाबलों द्वारा जम्मू-कश्मीर में जारी ऑपरेशन ऑलआउट आतंकियों के लिए काल बनती जा रही है। जम्मू-कश्मीर में मंगलवार को मुठभेड़ में मारे गए 2 दो दहशतगर्द महज दो महीने पहले ही आतंकी बने थे। घाटी में इस साल 82 नए युवाओं ने आतंक की राह पकड़ी है। जिसमें ये दोनों भी थे। आंतकी के तौर पर ये महज दो महीने ही जिंदा रह पाए। सिक्यॉरिटी एजेंसी सूत्रों के मुताबिक घाटी में युवा आतंक की राह पर जा रहे हैं लेकिन, एक आतंकी के तौर पर उनकी लाइफ एवरेज 6 महीने ही रहती है। एक आतंकी तो महज 15 मिनट ही आतंकी रह पाया। कुछ गिने-चुने लोग ही 8-9 महीने आतंकी के तौर पर जी पाते हैं और फिर सुरक्षा बलों का निशाना बनते हैं। इस साल 82 की भर्ती सिक्यॉरिटी एजेंसी सूत्रों के मुताबिक इस साल अब तक जम्मू-कश्मीर के 82 युवा आतंकी संगठन में शामिल हुए हैं। इनमें से करीब 40 युवा हिजबुल मुजाहिदीन में करीब 16 युवा लश्कर-ए-तैयबा में और बाकी जैश-ए-मोहम्मद में शामिल हुए हैं। इन 82 नए आतंकियों में शोपियां से करीब 22 युवा और 20 से ज्यादा युवा पुलवामा जिले से हैं। आतंकी संगठनों में शामिल हुए ज्यादातर युवा 18 से 20 साल की उम्र के हैं। 2017 में जम्मू-कश्मीर के 128 युवा, 2016 में 88 और 2015 में 66 युवा आतंकी संगठनों में शामिल हुए थे। इस साल सिक्यॉरिटी एजेंसी अब तक 101 आतंकियों का सफाया कर चुकी है।

अप्रैल में हुई सबसे ज्यादा भर्ती इस साल आतंकी संगठन में सबसे ज्यादा रिक्रूटमेंट अप्रैल महीने में हुआ। इस महीने 25 से ज्यादा युवाओं ने आतंकियों का साथ चुना। सूत्रों के मुताबिक किसी भी आतंकी के अंतिम संस्कार के वक्त भीड़ जमा होने और आतंकियों की तरफ से भड़काऊ भाषण के बाद ज्यादातर युवा बहकावे में आ जाते हैं और आतंक की राह चुनते हैं। अप्रैल की शुरुआत में 13 आंतकी मारे गए और उनके अंतिम संस्कार के बाद इस महीने ज्यादा युवाओं ने आंतकियों का साथ चुना। मई के महीने में 10-12 युवा आतंकियों के साथ गए और जून में 20 से ज्यादा।

पैरंट्स के जरिए वापस लाने की कोशिश सिक्यॉरिटी एजेंसी सूत्रों के मुताबिक फिलहाल आतंकियों से निपटने के लिए दो स्तर पर काम हो रहा है। ऑपरेशन ऑलआउट के तहत आतंकियों का सफाया किया जा रहा है साथ ही बहकावे में आकर आतंक की राह पर गए युवाओं को वापस लाने की कोशिश हो रही है। सिक्यॉरिटी एजेंसी आतंकी संगठनों के साथ गए युवाओं को उनके पैरंट्स के जरिए उन्हें समझाने और वापस लाने की कोशिश कर रही है। सूत्रों के मुताबिक इस कोशिश में कई युवाओं ने आतंक की राह से तौबा की है और वापस मेन स्ट्रीम में आए हैं। ऐसे युवाओं की पहचान भी गुप्त रखी जाती है ताकि वह सुरक्षित रहें। ऑपरेशन के वक्त भी लोकल आतंकियों को यह मौका दिया जाता है कि वह आतंक की राह छोड़ दें। सूत्रों के मुताबिक आतंकी संगठन युवाओं को अपने साथ शामिल तो कर लेते हैं लेकिन न उनके पास हथियार हैं न ही उनकी ट्रेनिंग होती है। नए रिक्रूट हुए आतंकी की लाइफ सबसे ज्यादा खतरे में होती है। आतंकी उन्हें सुरक्षा बलों से हथियार छीनने के काम में लगाते हैं लेकिन यहां आने तक उनकी लाइफ खत्म हो जाती है। पैरंट्स के जरिए राह भटके युवाओं को यही समझाने की कोशिश की जा रही है।


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