कविता सागर


हमारा मन सागर ही तो है , उठती गिरती हैं तरंगे अनेक विविध भावनाओं की । सागर की अथाह गहराई पार पा न सका कोई अब तक प्रयास जारी है। मन भी सागर सरीखा है जान न सका कोई इसको जानने का प्रयास कर डाला अनेकों तरीके से । सागर के ज्वार भाटे में अनेक दर्द सिमटा है । कितनी नदियों का समर्पण मासूम पीड़ा है । मन भी तो न जाने कितने दर्द को समेटे हुए अपने ज्वार भाटे की अभिव्यक्ति देता है । सागर आखिर सागर है समा लेता है बिना चाहत के घहराती उफनती नदी के जल को खुद में । मन भी समाता है अपने और पराये सभी के दिये हुए अनचाहे प्रदत्त पीड़ा को । सागर मन , मन सागर है ..........।

डा.सरला सिंह नई दिल्ली


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