शरणागत भारत


राजनीति के महापंडितो की माने तो आजकल राजनीति में नये नये हथकंडो का चलन बढ़ा है । जहॉ एक और जनता से टैक्स की अपील कर रहा सरकारी तंत्र वही दुसरी और उसी टैक्स से बने आवासो से टोटियॉ तक उखाड़ कर ले जा रहे नेता । हाईकोर्ट तक ने मान लिया कि भारतीय राजनीति गर्त की ओर बढ़ चली है । छलपूर्ण नये नारों के जाल में जनता को फंसाना, उन्हे जाति धर्म संगठन आदि के नाम से लड़ाना ये आजकल के नेताओं का मुख्य चुनावी हथियार हो चले है ।जाति-संप्रदाय मुख्यतः दो कारणों से संगठित होता है , एक उन्हे भयावह परिणाम की कल्पना कराकर ,या दुसरा उन्हे झुठे आकड़े दिखाया जाय । पहला कारण है बुद्धिहीनता और दूसरा असुरक्षा-भाव ।जो जाति जितनी अधिक बुद्धिहीन होगी, उतनी सुगमता से नेताओं के झॉसे मे फंसी होगी । इस बात को समझकर जाति के नेता उसकी बुद्धि को कभी विकसित नहीं होने देते । कारण यह है कि बुद्धि विकसित होते ही जनता सोचने-समझने लगेगी और कभी उसकी बुद्धि अगर कहेगी कि इस नेता के पीछे चलना नुकसानदेह है, तो नहीं चलेगी । और राजनेता को 'ना' नहीं चाहिए, उदाहरण प० बंगाल की ममता बेनर्जी जी को देख लिजीए या केरला में कॉंग्रेस सरकार को देख लिजीए ।ये दो उदाहरण वर्तमान मे मुस्लिम वोटरो को बहला फुसला कर अपना उल्लू सीधा कर रहे । क्योकि इन राज्यो मे जब कोई हिन्दू मरता है तो उसे नक्सलवाद कह कर दबा दिया जाता है पर जब कोई मुस्लिम मरता है तो बकायदा जॉच कमेटी बैठायी जाती है । इसलिए राजनेता कभी ऐसा काम नहीं करते जिससे पिछलग्गुओं की बुद्धि खिले ।जाति-संप्रदाय के संगठित होने का दूसरा बड़ा कारण है असुरक्षा-भाव । अल्पसंख्यक बहुसंख्यक से डरा-डरा रहता है । भय के कारण वह संगठित होना चाहता है और होताभी है । राजनेता उसके भय का फायदा उठाते हुए उसे वांछित-अवांछित सहारा देकर अपने पक्ष में करना चाहता है ।इसका भी उदाहरण है बिहार मे तेजस्वी यादव गुट इस गुट मे वोट बैंक के लिए नेताओं के बीच छीना-झपटी देखी जा सकती है, और सही मायने में बिहार और उ० प्र० तुष्टीकृत राजनीति का जन्मदाता है । देश-हित कहीं दूर पीछे छूट जाता है ।कुछ राजनेताओं की निगाह बहुसंख्यक वोट पर पड़ती है । अल्पसंख्यकों की बढ़ती ताकत का डर पैदा कर या उनकी भावनाओं को भड़काकर एक बड़ा गेम खेलना चाहते हैं और लगातार लगे रहकर अंततः सफलता प्राप्त कर लेते हैं ।सफलता का दूसरा बड़ा कारण है नये-नये चमकदार नारों का जाल रचना । जैस --- गरीबी हटाओ, सुशासन, समाजवाद, शाइनिंग इंडिया, इत्यादि ।मायावती जी इस क्षेत्र की बेहतरीन खिलाड़ी है । सही मायनो में जातिगत राजनीति की शुरूआत का श्रेय मायावती और कॉशीराम जी को ही जाता है । कुछ दलित हित सम्बन्धित नारे दिये और पांच सालों के अंदर जनता भलीभांति इन नारों के पिछे दौड़ लेती है । फिर नये नारे, नये धोखे रचे जाते हैं ।नेतागण अपनी कपट-चालों से एक सामूहिक सम्मोहन की रचना करते हैं । सम्मोहन उस अवस्था का नाम है, जब सम्मोहित व्यक्ति पूरे संसार के प्रति सो जाता है, लेकिन अपने मार्गदर्शक के प्रति जागा रहता है ।उसके दिशा-निर्देश के पालन में अपना परम कल्याण समझता है । अपने नेता के आचार-विचार को लेकर इतना अंधा हो जाता है ,कि उसके खिलाफ कुछ सुनना नहीं चाहता । अगर कोई सुना दे तो उसपर हमला बोल देता है । अपने नेता का बुरा आचरण भी उसे अच्छा लगने लगता है और उसके बचाव में लोग देश हित तक को ताक पर रख देते है ।"तुम्हरा राजा भ्रष्टाचार किया है, हमरा राजा भी करेगा " समाजवादीयों का यह मूल मंत्र है ।पूरा देश गलत राजनीति की गिरफ्त में है । सही राजनीतिके द्वारा इसे मुक्त किया जा सकता है । लेकिन इसकी कोई उम्मीद नहीं दिखती है, क्योंकि नयी पीढ़ी के लोग भी उसी विषैली राजनीति को अपना रहे हैं । सच कहूँ तो आज देश बाहर महाशक्ति बनने जा रहा पर अंदर कई खंडो मे बट कर अंतरद्वंद कर रहा । ---- पंकज कुमार मिश्रा जौनपुरी ।


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