जल संरक्षण के लिए जन जागरण आवश्यक है

 

भारत जब आजाद हुआ था तब 5000 घन मीटर प्रति वर्ष प्रति व्यक्ति पानी हमें प्राकृतिक विरासत के रूप में मिला था। आज़ादी के अभी 70 वर्ष ही व्यतीत हुए हैं लेकिन पानी का यह आंकड़ा घटकर 2000 घन मीटर के नीचे पहुँच गया है। एक अनुमान के मुताबिक अगर यही हाल रहा तो सन 2047 तक यह आंकड़ा  1200 घन मीटर रह जायेगा। इसके आगे की तश्वीर तो और भी भयावह होगी। प्रश्न उठता है कि इतना सब जानने के बाद भी पानी संरक्षण के प्रति हम अब तक संवेदनहीन क्यों बने हुए हैं ?  जल संरक्षण के नाम पर सरकार की ओर से किये गये अब तक के लगभग सभी प्रयास धराशायी ही दिखाई देते हैं। पानी का सीधा सम्बन्ध आम आदमी से है तब फिर आम आदमी को ही इसके लिए पहल करनी चाहिए लेकिन जागरूकता के अभाव में यह पहल न के बराबर ही है। अपने परिवार की खुशहाली के लिए हम दुनियां के सभी संसाधन जुटाने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। परिवार के प्रत्येक सदस्य की ख़ुशी में ही हम अपनी ख़ुशी ढूढ़ते है। पर जरा सोचिये अगर किसी दिन हमारा वही परिवार पानी की कमी से तड़प-तड़प कर दम तोड़ दे, तो क्या होगा उन सभी सुख-सुविधाओं का जो हमने रात-दिन एक करके जुटाई हैं। अपने परिवार की जान बचाने के लिए हजारों, लाखों रुपया खर्च करके भी यदि हमें पानी उपलब्ध न हो पाया तब हम क्या करेंगे? पानी के प्रति शायद हम इसलिए संवेदनहीन बने हुए हैं क्योंकि भविष्य का यह भयावह संकट हमें आज दिखाई नहीं दे रहा है। हमें लगता है कि यह तो सिर्फ आकड़ों का खेल है। बीते हजारों वर्षों में जब पानी समाप्त नही हुआ तब फिर अगले बीस-पचास वर्षों में जमीन से पानी की रिक्तता भला कैसे सम्भव है।
   नीति आयोग की ताजा रिपोर्ट के अनुसार भारत के 600 मिलियन अर्थात 60 करोड़ लोग पानी की भयंकर समस्या से जूझ रहे हैं। देश के लगभग तीन-चैथाई घरों को पीने के लिए पानी उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। प्रति वर्ष लगभग 2 लाख लोग पानी के अभाव में दम तोड़ देते हैं। देश का लगभग 70 प्रतिशत जल प्रदूषण की चपेट में है। पानी की गुणवत्ता सूचकांक में विश्व के 122 देशों में भारत 120वें स्थान पर है। जल संकट के मामले में अब तक के अपने इतिहास में भारत सबसे ख़राब दौर से गुजर रहा है। सन 2030 तक देश की जल-मांग उपलब्ध आपूर्ति से दो गुना होने की सम्भावना है। 
  जल संसाधन मन्त्रालय के एकीकृत जल संसाधन विकास के लिए गठित राष्ट्रीय आयोग के सर्वेक्षण के अनुसार देश में पानी की वर्तमान खपत 695 अरब घन मीटर है जबकि सन 2050 तक यह खपत बढ़कर 1,180 अरब घन मीटर होने की सम्भावना है। इस समय देश में पानी की उपलब्धता 1,137 अरब घन मीटर के लगभग है। जो कि भविष्य में होने वाली मांग से बहुत कम है। ऐसे में पानी को लेकर जो त्राहि-त्राहि मचने वाली है असके अनुमान से ही रूह काँप जाती है। अगर इस समस्या का समय रहते हल न निकाला गया तो भविष्य का परिदृश्य अत्यन्त भयावह होगा। 
  भारत की सत्तर प्रतिशत आबादी अर्थात लगभग 80 करोड़ लोग ग्रामीण क्षेत्र में निवास करते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में लोगो को पीने के अलावा खेतों की सिंचाई के लिए भी पानी चाहिए। हालाकि नीति आयोग की रिपोर्ट ग्रामीण क्षेत्रों में पानी के मामले में उल्लेखनीय सुधार की बात करती है। रिपोर्ट के मुताबिक 87 प्रतिशत ग्रामीण जनसंख्या के पास पानी पहुँच रहा है। परन्तु वास्तविकता इससे काफी अलग है। बुन्देलखण्ड जैसे क्षेत्रों में पूरे वर्ष पानी की भारी किल्लत रहती है। नदी, नाले और तालाब न जाने कब के सूख चुके हैं। कुओं का अस्तित्व ही नहीं बचा है। आधे से अधिक हैण्डपम्प जवाब दे चुके हैं। जो चल रहे हैं उनमें से ज्यादातर में गन्दा पानी आता है। नहरें सूखी पड़ी हैं। जिन नहरों में पानी है भी वह टेल तक नहीं पहुँचता है। जिससे फसलों का सूखना स्वाभाविक है। ऐसे में सिंचाई के लिए ट्यूववेल ही एक मात्र साधन बचते हैं। जिनके कारण भूगर्भ जल भण्डार निरंतर खाली होता चला जा रहा है। भूवैज्ञानिकों के अनुसार भूजल के अंधाधुंध दोहन से धरती के अन्दर पानी का उत्प्लावन बल धीरे-धीरे कम हो जाता है या फिर पूरी तरह से समाप्त ही हो जाता है। जिससे धरती के धसकने और फटने की घटनाओं में बेतहाशा वृद्धि होती है। हाल ही में उत्तर प्रदेश के बुन्देलखण्ड, अवध तथा बृज क्षेत्र के आगरा में धरती धसकने और फटने की हुई अनेक घटनाओं ने इसकी पुष्टि भी कर दी है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार 92 प्रतिशत भूजल कृषि क्षेत्र में प्रयोग होता है। इसके लिए सरकार द्वारा सिंचाई हेतु बिजली पर दी जाने सब्सिडी को जिम्मेदार बताया गया है। किसानों की भी मजबूरी है। नहरों और तालाबों में यदि पर्याप्त जल पूरे वर्ष उपलब्ध रहे तो किसानों को बिजली खर्च करके भूजल से सिंचाई करने की नौबत ही क्यों आये। एक अनुमान के मुताबिक देश की औद्योगिक इकाइयाँ एक दिन में धरती से जितना पानी खीच लेती हैं, एक गाँव पूरे महीने में उतने पानी का प्रयोग नहीं कर पाता है। इनमें भी सबसे अधिक पानी शीतल पेय और बोतल बन्द पानी बेचने वाले उद्योग कर रहे हैं।
   
शहरों का गन्दा पानी और औद्योगिक कचरा गंगा, यमुना तथा ऐसी लगभग सभी नदियों में निर्बाध रूप से प्रवाहित हो रहा है जिससे ये सदानीरा नदियाँ भयंकर प्रदूषण की चपेट में हैं। गंगा सफाई के नाम पर अब तक अरबों रूपया खर्च हो चुका है लेकिन गंगा के प्रदूषण में कहीं कोई कमी नहीं दिखाई दे रही है।
  अब समय आ गया है जब देश और प्रदेश की सरकारों के साथ-साथ आम जन को भी जल संरक्षण के लिए बड़ी पहल एक अभियान के रूप में करनी होगी। इसके लिए वर्षा जल संचयन, रेन-वाटर-हार्वेसिं्टग जैसे उपाय बेहद अहम् साबित हो सकते हैं। शहरी तथा औद्योगिक क्षेत्रों में रेन-वाटर-हार्वेसिं्टग को अनिवार्य बनाए जाने की आवश्यकता है। खेतों की सिंचाई के लिए सिं्प्रकलर, पोर्टेबल सिं्प्रकलर, माइक्रो सिं्प्रकलर तथा ड्रिप सिंचाई जैसी तकनीक अपनायी जानी चाहिए। इससे जहाँ पानी की पचास प्रतिशत बचत होती है वहीँ उत्पादन डेढ़ गुना तक बढ़ जाता है। 

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