• वंदिता मिश्रा, ब्यूरो प्रमुख लखनऊ

उत्तर प्रदेश में पॉलिटेक्निक शिक्षा - एक रिपोर्ट


वंदिता मिश्रा,ब्यूरो प्रमुख लखनऊ

2015 में केंद्र सरकार ने अपने फ्लैग्शिप कार्यक्रम स्किल इंडिया मिशन की शुरुआत की। इसका उद्देश्य था 2022 तक लगभग 40 करोड़ प्रशिक्षित वर्ग को पैदा करना। विषय की गंभीरता और आवश्यकता को समझते हुए केंद्र सरकार द्वारा मिशन के लिए अलग से कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय की स्थापना की गई। विभिन्न संस्थान खोले गए ताकि अन्य संस्थानों का अवसंरचनात्मक उन्नयन किया जा सके। प्रधानमंत्री का मानना था कि कौशल का विकास तकनीकी एवं गैरतकनीकी दोनों क्षेत्रों में समान रूप से तथा देश के भविष्य की आवश्यकता के अनुसार ही होना चाहिए। तकनीकी क्षेत्र में कौशल विकास एवं प्रशिक्षण का शुरुआती दायित्व जिन सार्वजनिक संस्थानों पर है उनमें आई.टी.आई. तथा पॉलिटेक्निक संस्थानों की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। जहाँ आई.टी.आई. मुख्यरूप से प्रशिक्षण के व्यावहारिक पक्ष पर ज्यादा जोर देने के लिए बने हैं, वहीं पॉलिटेक्निक संस्थानों को व्यावहारिक विज्ञान के साथ-साथ शुरुआती लेकिन सशक्त तकनीकी दृष्टिकोण को विकसित करने के उद्देश्य से बनाया गया था।

उत्तर प्रदेश एक 20 करोड़ से भी अधिक आबादी वाला राज्य है जिसे यदि विश्व जनसंख्या मानचित्र पर देखें तो यह दुनिया का पाचवाँ सबसे बड़ा ‘देश’ हो जाता है। ऐसे में भारत में किसी भी योजना को सफल बनाने के लिए उत्तर प्रदेश राज्य का सहयोग और प्रगति सबसे ज्यादा मायने रखती है।

उत्तर प्रदेश में लगभग 2628 पॉलिटेक्निक संस्थान हैं, इसमें 147 संस्थान राजकीय अर्थात सरकारी हैं, 1155 संस्थान प्राइवेट और 1326 ऐसे संस्थान हैं जो प्रदेश सरकार के अन्य विभागों द्वारा संचालित होते हैं. इन सभी संस्थानों में 2 लाख 31 हजार 387 सीटें उपलब्ध हैं। जबकि सरकारी पॉलिटेक्निक संस्थानों में लगभग 32 हजार सीटें प्रतिवर्ष के लिए उपलब्ध रहती हैं। इन कुल सीटों में 50 से 60 प्रतिशत सीटें खाली रह जाती हैं। वर्ष 2020-21 के आंकड़े ही ले लीजिये सरकारी पॉलिटेक्निक संस्थानों में करीब 20% सीटें खाली थीं| जबकि प्राइवेट संस्थानों की 1 लाख से अधिक सीटें (60%) खाली थी| खाली सीटों का अर्थ है कि इन सीटों के लिए कोई भी छात्र आवेदन नहीं करता। संयुक्त प्रवेश परीक्षा परिषद के सचिव एस.के. वैश्य ने हाल ही में एक अख़बार को बताया कि इस वर्ष की प्रवेश प्रक्रिया समाप्त हो गई है, और सरकारी प्राइवेट मिलाकर करीब 52 फीसद सीटें खाली रह गई हैं (नवम्बर 2020 दैनिक जागरण)। परन्तु  प्रवेश परीक्षा और खाली सीटों के सम्बन्ध में जब संयुक्त प्रवेश परीक्षा परिषद्, उ.प्र. सरकार के सचिव श्री एस के वैश्य से (6 जनवरी, 2021) मैंने बात की तो उनका कहना था “नहीं! मेरे पास तो जो डेटा है वो ऐसा नहीं है हमारी 85 फीसदी सीटें भरी हुई हैं|” उन्होंने ये भी कहा कि “इस बार लगभग 1,50,000 (एक लाख 50 हजार) छात्रों ने तो परीक्षा ही नहीं दी, हाँ ये बात जरुर है कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के कठोर नियमों व महिला पॉलिटेक्निक संस्थानों में कम प्रवेश को मुख्यरूप से खाली सीटों के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है|” जबकि वास्तविकता तो ये है कि खाली पड़ी लगभग 2 लाख सीटों के लिए बिना परीक्षा दिए सीधे प्रवेश दिए जाने की बात सामने आई है| कोरोना महामारी का इस वर्ष कुछ प्रभाव हो सकता है, किन्तु पिछले कई वर्षों में भी सीटें कभी नहीं भरीं जा सकीं| कोरोना दौर में हुई संयुक्त प्रवेश परीक्षा में छात्रों की संख्या नाममात्र की ही कम थी (पिछले साल से मात्र 4500 कम), तो फिर एडमिशन में 52% सीटें कैसे खाली रह गयीं? जबकि देश भर में उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रवेश लेने वाले छात्रों की संख्या कोरोना काल में बढ़ी है| कहीं इसके पीछे नीतिगत एवं ज़मीनी अव्यवस्थाओं से जूझते पॉलिटेक्निक संस्थानों की लचर हालत तो जिम्मेदार नहीं?

तकनीकी शिक्षा एवं ट्रेनिंग के लिए उत्तर प्रदेश में 1960 से एक बोर्ड उपलब्ध है जिसे 1962 में वैधानिक दर्जा भी प्रदान किया गया था। उत्तर प्रदेश के सभी आईटीआई एवं पॉलिटेक्निक संस्थान ‘उत्तर प्रदेश प्राविधिक शिक्षा अधिनियम -1962’ से संचालित होते हैं। इस समय उत्तर प्रदेश के विभिन्न पॉलिटेक्निक संस्थानों में 3 वर्ष के लगभग 67 क्षेत्रों में डिप्लोमा कोर्स करवाए जाते हैं। शायद ही कोई महत्त्वपूर्ण क्षेत्र रह गया हो जिसमें डिप्लोमा कार्यक्रम उपलब्ध न हो। यहाँ तक की एआईसीटीई द्वारा सत्र 2020-21 के लिए फोर्थ इंडस्ट्रियल रिवोल्यूशनके आयाम जैसे- आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, थ्री डी प्रिंटिंग, रोबोटिक्स तथा मशीन लर्निंग जैसे उन्नत एवं आधुनिक क्षेत्रों में भी डिप्लोमा कार्यक्रम के लिए अनुमति प्रदान कर दी गयी है।

2014 में लोकसभा में जवाब देते हुए संबंधित मंत्रालय के मंत्री महोदय ने लगभग एक हजार नए पॉलिटेक्निक संस्थानों को खोलने की बात कही थी। 2015 के बाद लगभग 300 नए संस्थानों के लिए भी योजना तैयार की जा चुकी है। कुछ के लिए धन आवंटित किया जा चुका है तो कुछ का निर्माण कार्य भी शुरू हो चुका है।

परंतु अगर हम उत्तर प्रदेश में पहले से विद्यमान सरकारी पॉलिटेक्निक संस्थानों की हालत देखें तो विद्यार्थियों में संस्थान के प्रत्येक स्तर पर निराश करने वाली स्थिति ही दिखाई देती है। विद्यार्थियों में यह निराशा प्राथमिक स्तर पर अध्यापन और शिक्षण की गुणवत्ता को लेकर है, कॉलेजों का उद्योगों के साथ ट्रेनिंग स्तर पर जुड़ाव ना होना उन्हे न सिर्फ उद्योगोंमुख होने से रोकता है बल्कि करिअर में आगे बढ़ने को लेकर अंधकार भी पैदा करता है। और अंततः लचर एवं स्तरहीन ट्रेनिंग और प्लेसमेंट उनके भविष्य की रीढ़ तोड़ देता है।

कौशल के विकास में समस्या

पॉलिटेक्निक संस्थान कौशल, प्रशिक्षण व औद्योगिक विकास की प्रमुख कड़ी हैं | किन्तु पॉलिटेक्निक शिक्षाव्यवस्था नीति-निर्माता और नीतियों को जमीन में उतारने वाले सरकारी संस्थाओं व कर्मियों के बीच फँसकर लचर होती गई| कोई सरकार नहीं चाहेगी कि करोड़ों रूपए की सरकारी मदद के बावजूद उसके छात्र मूलभूत सुविधाओं से वंचित रह जाएँ| दुर्भाग्यवश उत्तर प्रदेश के सरकारी पॉलिटेक्निक संस्थानों में यही हो रहा है| यहाँ के छात्र और संस्थान दोनों सरकारी मदद के बावजूद विभिन्न समस्याओं से जूझ रहे हैं। इन समस्याओं के मुख्यतया दो पहलू हैं| पहला- तकनीकी अवसंरचना की कमी और दूसरा- संस्था विशेष से जुड़ी समस्याएँ|

किसी भी तकनीकी संस्थान में तकनीकी अवसंरचना उस संस्थान के छात्रों को न सिर्फ तराशती है बल्कि उनके भविष्य को भी निर्धारित करती हैं| उत्तर प्रदेश के राजकीय पॉलिटेक्निक संस्थान अपर्याप्त बिजली, अपूर्ण प्रयोगशालाएं, नयी किताबों का अनुपस्थित होना, अध्यापकों की कमी व संस्थान की मुख्यालय से दूरी आदि से जूझ रहे हैं| किसी कॉलेज में बिजली नहीं आती तो किसी कॉलेज का पुस्तकालय कभी नहीं खुला| किसी में प्रयोगशाला के उपकरण ख़राब हैं, तो किसी में उपकरण सिर्फ कागजों में उपलब्ध हैं| जबकि सरकार के अनुसार वो पूरा पैसा और सुविधाएँ प्रदान कर रही हैं, परन्तु ये सुविधाएँ शायद नीचे तक पहुँच नहीं बना पा रही हैं|

दूसरी समस्या के बीज पॉलिटेक्निक कॉलेजों के प्रशासन में पनप रहे हैं| उदाहरण के लिए - कक्षाओं का रेगुलर न लगना, कोर्स पूरा न होना, अध्यापकों का समय पर क्लास न लेना, छात्रों के साथ अध्यापकों का इनटरैक्टिव संबंध न होना, अध्ययन व शिक्षकों को लेकर छात्रों हेतु शिकायत फोरम का अभाव तथा ट्रैनिंग एवं प्लेसमेंट अधिकारी (TPO) की निष्क्रिय भूमिका जैसे प्रमुख कारण आदि।

इसके अतिरिक्त एक तीसरी समस्या छात्रों में अपने भविष्य को लेकर है। JE जैसे पदों के लिए नाममात्र की सरकारी नौकरी ही उपलब्ध हैं। सरकारी नौकरी की समस्याओ को लेकर छात्रों में एक खास किस्म की निराशा का भाव पनप चुका है। कानपुर ज़ोन में स्थित राजकीय पालीटेक्निक, घाटमपुर के एकछात्र से जब पूछा कि सरकारी पॉलिटेक्निक में आपको कोई समस्या है? तो उसने जो जवाब दिया वो सिर्फ जवाब नहीं बल्कि संस्थागत और अवसंरचनात्मक समस्याओं का पिटारा था। ऑटमोबाइल ब्रांच से डिप्लोमा कर रहे इस छात्र ने कहा कि “मैडम यहाँ नाम मात्र की बिजली आती है इसलिए हम अपने ज्यादातर प्रैक्टिकल नहीं कर पाते। लेथ मशीन जैसी हैवी मशीने किसी इंवर्टर से नहीं चल सकती, बिना बिजली के ये मशीनें चल ही नहीं सकतीं। बिजली उपलब्ध भी हो तब भी हमारे पास बहुत से ऐसे उपकरणों का अभाव है जिनकी प्रैक्टिकल के दौरान हमें जरूरत पड़ती है।” लाइब्रेरी को लेकर जो जवाब मिला वो तो पूरी तरह चौंकाने वाला था। डिप्लोमा के द्वितीय वर्ष के एक छात्र ने कहा “आज तक कभी लाइब्रेरी खुली ही नहीं।”

कौशल विकास की रीढ़ समझे जाने वाले इन संस्थानों में यदि डिप्लोमा अवधि में कभी लाइब्रेरी नहीं खुली, और ज्यादातर समय बिजली नहीं आई तो हम स्वतः ही समझ सकते हैं कि यहाँ के छात्रों को कैसी ट्रेनिंग मिलेगी और उनका कैसा कौशल विकास होगा।

कानपुर महानगर के कॉलेज की समस्याएं भी ‘महानगरीय’ हैं। यहाँ के एक छात्र ने तो यहाँ तक कह दिया की अगर हम कॉलेज के किसी शिक्षक से शैक्षणिक सुविधाओं को लेकर कभी मांग कर लें तो वो नाराज़ हो जाते हैं, प्रधानाध्यापक तक पहुँच जायें तो कॉलेज प्रशासन द्वारा हमारे साथ हिंसक बर्ताव तक कर दिया जाता है। अध्यापक समय से क्लास में नहीं आते। कानपुर के राजकीय पॉलिटेक्निक कॉलेज के एक छात्र का कहना है कि “हम ‘गूगल’ और यू ट्यूब के भरोसे अपना डिप्लोमा पूरा कर रहे हैं। एक तो समय पर क्लास पूरी नहीं होती, और अगर हो भी जाए तो क्लास खत्म होने के बाद कुछ ‘गेन’ हुआ हो, ऐसा कभी नहीं लगता”। मुख्यालय से दूर स्थित पॉलिटेक्निक संस्थानों में एक अलग किस्म की समस्याओं से सामना होता है। सुदूर स्थित ऐसे पॉलिटेक्निक संस्थान इतने इन्टीरीअर में होते हैं कि किसी सरकारी परिवहन सुविधा का भी संचालन यहाँ नहीं होता। इसकी वजह से सबसे ज्यादा समस्याओं का सामना छात्राओं को करना पड़ता है, कुछ छात्राएं बीच में ही कोर्स छोड़ देती हैं और कुछ क्लास करने से कतराती है। हमारे सामाजिक ढांचे में महिलायें जिस पायदान पर हैं वहाँ उनके लिए ‘अवसर’ मिलना ही बड़ी बात होती है। महिलायें सरकारी विद्यालयों में मिले इन अवसरों को खोना नहीं चाहतीं परंतु कुछ कॉलेज ऐसी लोकेशन पर स्थित होते हैं कि घरवाले इन छात्राओं को यहाँ प्रवेश नहीं लेने देते और अगर कुछ लेने भी देते हैं तो छात्रा और उसके परिवार वाले हमेशा सुरक्षा की चिंता में ही रहते हैं।

इसके अतिरिक्त मार्च 2020 से शुरू हुए कोविड-19 ने समस्याओं में वृद्धि कर दी है| यह महामारी अचानक आई,ऐसी आपदा के लिए भारतीय शिक्षण संस्थान अच्छे से तैयार नहीं थे| अचानक से कक्षाएं बंद हो गयीं, स्टडी मटेरियल मिलना बंद हो गया, प्रैक्टिकल पहले ही कम होते थे अब बिल्कुल बंद हो गए, जबकि पॉलिटेक्निक शिक्षा को यदि साधारण व्यक्ति की भाषा में समझें तो इसका अर्थ ही है “प्रैक्टिकल शिक्षा”| आज भी प्रदेश के ज्यादातर ग्रामीण क्षेत्रों में अच्छी इन्टरनेट कनेक्टिविटी नहीं है जिसकी वजह से ऑनलाइन शिक्षा और क्लासेज होना संभव नहीं है| ऐसे में पॉलिटेक्निक समेत तमाम व्यावसायिक शिक्षण संस्थानों को कोरोना महामारी से भारी नुकसान हुआ और इसका सबसे ज्यादा खामियाजा छात्रों ने भोगा|

सरकारी नौकरी और भविष्य की चिंता

पॉलिटेक्निक कोर्स को लेकर यदि हम थोड़ा गहराई में जाएँ तो हमें ऐहसास होगा कि ज्यादातर छात्र एवं छात्राएं ऐसे हैं जिन्हे नौकरी की आवश्यकता होती है या ये कहें की वो बीटेक में एडमिशन लेने के लिए कोचिंग संस्थानों में लाखों रुपये की फीस देने में असक्षम होते हैं। इसलिए जल्दी ही एक ऐसे कोर्स में एडमिशन ले लेते हैं जिससे जितना जल्दी हो नौकरी मिल जाए। परंतु एक पॉलिटेक्निक छात्र के पास भविष्य की क्या संभावनाएं हैं, उसे शुरुआत से नहीं पता होता। संस्थानों में जाने के बाद ही पता चलता है कि यहाँ सरकारी नौकरी तो बहुत मुश्किल है। प्राइवेट नौकरी में शुरुआत में ना डिप्लोमा के अनुसार जॉब प्रोफाइल मिलता है, और न ही सरकारी-जैसी सैलरी। यही कारण है कि बहुत से डिप्लोमा होल्डर्स प्राइवेट जॉब छोड़ देते हैं। पॉलीटेक्निक छात्रों के ट्रेनिंग और प्लेसमेंट पर काम करने वाली एक संस्था “मेधा” के अनुसार पालीटेक्निक डिप्लोमा कोर्स पास करने के बाद लगने वाली प्राइवेट नौकरी को 60 से 70% छात्र जॉइन ही नहीं करते, जिसका प्रमुख कारण छात्रों की आकांक्षाओं व प्राइवेट जॉब में मिलने वाली सैलरी के बीच का अंतर ही है। जबकि प्लेसमेंट अधिकारियों के अनुसार उनके ज्यादा से ज्यादा छात्र जॉब कर रहे हैं, इसका प्रमाण वो कागजों में दिखा ही देते हैं, परन्तु सच्चाई ये होती है कि छात्र जॉब न करते हुए इलाहाबाद जैसे शहरों को प्रस्थान करते हैं, और JE जैसी सरकारी नौकरियों के लिए वर्षों तक तैयारी में लगा देते हैं|

सरकारी नौकरी, जूनियर इंजीनियर (JE) के लिए बहुत से डिप्लोमा होल्डर्स सपने देखते हैं और भरपूर तैयारी भी करते हैं, परंतु यहाँ समस्या ये है कि जूनियर इंजीनियर के लिए पदों की भर्ती इतनी आसानी से आती ही नहीं। मिसाल के तौर पर उत्तर प्रदेश में 2013 में जूनियर इंजीनियर की भर्ती निकली थी जिसकी भर्ती प्रक्रिया 2017 में जाकर पूरी हो पाई और इसे भी 2017 में आई नई सरकार ने रद्द कर दिया। दोबारा भर्ती प्रक्रिया शुरू की गई और अभी हाल में लगभग 1400 नियुक्ति पत्र प्रदान किये गए। अब अगली भर्ती कब निकलेगी नहीं पता, नियुक्ति हो भी जाए तो ये नहीं पता कि नई सरकार आएगी तो नियुक्ति रद्द होगी या नहीं। मतलब छात्र ! जिस पर अनंत दबाव रहता है, उसे नियुक्ति की इस अनिश्चितता से भी लड़ना होता है। इस लड़ाई के लिए उसने अपनी पढ़ाई के दौरान कोई ट्रैनिंग नहीं ली होती है।


उत्तर प्रदेश में उपस्थित अधिकांश पोलिटेक्निक संस्थान ऐसी ही संरचनात्मक समस्याओं से जूझ रहे हैं| गाजियाबाद जोन के गजरौला सुतावली के एक छात्र ने बताया कि थर्ड ईयर के छात्र होने के नाते उन्हें बाहर गाँव के एक घर में रहना पड़ रहा है क्योंकि हॉस्टल में नए एडमिशन होने है| छात्र ने यह भी बताया कि यहाँ तो प्लेसमेंट ही नहीं होते क्योंकि यह बहुत ही इंटीरियर में है| जब इन समस्याओं के बारे में प्राविधिक शिक्षा निदेशालय के निदेशक श्री मनोज कुमार से पूछा गया तो उन्होंने पॉलिटेक्निक संस्थानों की शहर से दूरी, पर कहा कि “शहर से संस्थानों की दूरी को हमें ग्रामीण विकास के नजरिये से देखना चाहिए| ग्रामीण क्षेत्रों में खुलने वाले संस्थान आसपास के ग्रामीण क्षेत्र के सर्वांगीण विकास में योगदान दे सकते हैं| यदयपि परिवहन सुविधाओं पर तथा संस्थान तक आसान पहुँच को लेकर अभी भी काफी कुछ किया जाना बाकी है|” लैबोरेटरी के विषय पर उनसे बात की गयी तो उन्होंने पहले तो कॉलेज के प्रिंसिपल पर प्रहार किया, उन्होंने कहा कि उन्हें जितना बजट मांगते हैं उतना दिया जाता है फिर उन्हें अव्यवस्था नहीं रखनी चाहिए क्योंकि बिना प्रैक्टिकल के पढाई कैसे संभव है? साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि “अव्यवस्था की जिम्मेदारी मै ही लेता हूँ, क्योंकि इन सभी की जिम्मेदारी अंततः मेरी ही तो है,” उनका कहना था कि “बहुत से छात्रों के पास मेरा नंबर है मैंने कहा है कि कोई भी दिक्कत हो तो मुझसे संपर्क करें” उन्होंने कहा कि सभी किताबें डिजिटल कर दी गयी हैं, बच्चे ब्रांच के अनुसार अपने पठन सामग्री को आसानी से प्राप्त कर सकते हैं. हाँ, प्रयोगशालों में अभी बहुत जगह काम करना बाकी है, और बहुत से ऐसे कॉलेज हैं जहाँ नियमित रूप से प्रयोगशालाएं चल रही हैं.”

समाधान के मौलिक आयाम

2016 में “वायर्ड” पत्रिका के फाउंडिंग एग्जीक्यूटिव एडिटर और विद्वान् केविन केली की एक पुस्तक आई थी. इस पुस्तक का नाम था ‘द इनएविटेबल्स’| इसमें केविन ने रोबोटिक्स एवं ब्लॉक चेन समेत भविष्य की 12 ऐसी टेक्नोलॉजीज का विस्तार से जिक्र किया है जो आने वाले समय में दुनिया को आकार देंगी| भारत दुनिया का सबसे ज्यादा ‘यंग’ देश है यहाँ 65% आबादी 35 वर्ष या इससे भी कम आयु की है| परन्तु यह आशा से भरी आबादी रोजगार भी चाहेगी |वहीं दूसरी तरफ़ दुनिया का लगातार बदलता तकनीकी ढांचा और आने वाली नयी तकनीकें नए कौशल की मांग करेंगी| ऐसे में कौशल विकास भारत की सबसे बड़ी आवश्यकता है| इसको ध्यान में रखकर केंद्र सरकार ने “स्किल इंडिया” के तहत कई पहलें की हैं| उदहारण के लिए प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (PMKVY), दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल्य योजना (DDU-GKY) इत्यादि | परन्तु इसमें दो राय नहीं हो सकती कि पॉलिटेक्निक संस्थान, आईटीआई संस्थान और अन्य वोकेशनल प्रशिक्षण संस्थान कौशल विकास की धुरी हैं| यह धुरी विभिन्न समस्याओं से जूझ रही है, जिसे तत्काल सुधारने की जरुरत है| हमें यह मानना पड़ेगा कि बेहतरीन ट्रेनिंग न सिर्फ कौशल प्रदान करती है, बल्कि नए विचारों और नए अविष्कारों को जन्म भी देती है| विवेन थॉमस, एक अश्वेत जिन्होंने दुनिया में ह्रदय सर्जरी की शुरुआत की, ऐसे ही एक उदहारण है| उनकी कहानी उनके श्वेत ट्रेनर अल्फ्रेड ब्लालॉक के चारों और घूमती है| थॉमस ‘ग्रेट डिप्रेशन-1929’ की वजह से डॉक्टर नहीं बन पाए थे, पर उनके ट्रेनर और ट्रेनिंग ने उन्हें अमर कर दिया.

विश्व अब लाखों करोड़ों की संख्या में विवेन थॉमस तैयार करने के लिए प्रतिबद्ध है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा स्वीकृत सस्टैनबल डेवेलपमेंट गोल्स (SDG) तो कम से कम यही कहते हैं। SDG 4.4 के अनुसार “2030 तक पर्याप्त संख्या में ऐसे युवाओं एवं वयस्कों की संख्या को विकसित करना है जिनके पास रोजगार, प्रतिष्ठित नौकरी एवं उद्यमिता के लिए तकनीकी एवं व्यावसायिक कौशल के साथ-साथ प्रासंगिक कौशल भी हो।”SDG गोल्स के प्रति प्रतिबद्ध भारत ने अपनी नई शिक्षा नीति-2020 (NEP-2020) में इस मुद्दे पर नीतिगत संज्ञान लिया है। भारत में व्यावसायिक शिक्षा की स्थिति अच्छी नहीं रही है। उदाहरण के लिए 12वीं पंचवर्षीय योजना (2012-17) में भारतीय कार्यबल (19-24 वर्ष) का मात्र 5% ही औपचारिक व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त था, इसमें आईटीआई एवं पालीटेक्निक भी शामिल हैं। वहीं वैश्विक स्तर पर यह आंकड़ा USA के लिए 52%, जर्मनी 75% तथा दक्षिण कोरिया में रिकार्ड 96% था। ऐसे में नई शिक्षा नीति में तय किया गया कि कौशल एवं प्रशिक्षण के स्तर को राष्ट्रीय जरूरतों के अनुसार बढ़ाना अत्यंत आवश्यक है। NEP-2020 में 2025 तक 50% विद्यार्थियों को विभिन्न कौशलों में प्रशिक्षित किये जाने का विज़न है। ऐसे में कौशल एवं प्रशिक्षण की धुरी माने जाने वाले पॉलिटेक्निक संस्थानों में मूलभूत एवं तत्काल परिवर्तन की आवश्यकता है।

उत्तर प्रदेश में पॉलिटेक्निक संस्थानों की हालत खस्ता है यद्यपि यह स्थिति हर कॉलेज की हर डिप्लोमा ब्रांच के साथ नहीं है। परंतु कमोबेश ये स्थिति ज्यादातर कॉलेजों में है। एक आँकड़े के अनुसार प्रदेश भर के पॉलिटेक्निक में इस समय लगभग 3400 फैकल्टी की जरूरत है, जबकि कुल 1100 ही उपलब्ध हैं। ऐसे में पर्याप्त और परमानेंट शिक्षकों की तत्काल आवश्यकता है। पॉलिटेक्निक संस्थाओं को उद्योगोन्मुख बनाने के साथ साथ करीबी उद्योगों से जोड़ने की भी आवश्यकता है। हमें नवाचार से भरे संगठनों की आवश्यकता है जो न सिर्फ प्लेसमेंट में मदद कर सकें बल्कि समय समय पर छात्रों की संस्थागत काउंसलिंग को भी बढ़ावा दे सकें। कॉलेजों को भी अपने स्तर पर छात्र-छात्राओं की काउंसलिंग करनी चाहिए, जिससे उनमें मुंगेरीलाल के हसीन सपने देखे जाने की प्रवृत्ति कम हो और विद्यार्थी आने वाली चुनौतियों और संभावनाओं के लिए तैयार हो सकें। डायरेक्टरेट ऑफ टेक्निकल एजुकेशन द्वारा कैरिकुलम को प्रतियोगी एवं अंतर्राष्ट्रीय मानकों पर परखना चाहिए।

प्रदेश में बहुत से पॉलिटेक्निक संस्थान अत्यंत दूर-दराज ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित हैं, जिसकी वजह से इनमें जो लोकेशन आधारित समस्याएँ हैं, उन्हें ठीक किये जाने की जरुरत है| उदाहरण के लिए प्रदेश के दूर-दराज के क्षेत्रों में अनवरत बिजली की आपूर्ति की जरुरत है, ताकि संस्थान और वहाँ की प्रयोगशालाएं समुचित ढंग से कार्य कर सकें| कोरोना काल में ऑनलाइन शिक्षा का महत्व बढ़ गया है ऐसे में जरुरत है हाई ब्रॉडबैंड इन्टरनेट कनेक्टिविटी की जो सस्ती हो और आसानी से उपलब्ध भी हो|

प्रदेश के तकनीकी शिक्षा निदेशालय को चाहिए कि वो ऐसी मैकेनिज्म विकसित करे जिसके माध्यम से संस्थानों में मिल रही शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार किया जा सके| संस्थानों में मिल रही मूलभूत सुविधाओं जैसे हॉस्टल, पुस्तकालय एवं ट्रेनिंग तथा प्लेसमेंट में पैनी नजर रखने के लिए समिति बनाने की जरुरत है, जोकि समय समय पर इन सुविधाओं के आंकलन के साथ-साथ इनमें सुधारों को लेकर अनुसंशायें भी कर सकें| लगभग सभी पॉलिटेक्निक संस्थानों में छात्रों की करियर काउंसिलिंग के लिए एक नयी पोस्ट सृजित की जानी चाहिए ताकि हमारी कौशल धुरी को सही दिशा दी जा सके| जरूरी ये भी है कि सरकार प्रवेश परीक्षा के पहले एक्स्पर्ट्स के माध्यम से आधिकारिक सलाह जारी करे ताकि छात्र समझ सकें कि उनके लिए या किनके लिए पॉलिटेक्निक डिप्लोमा लाभदायक होगा, और कैसे। ऐसा इसलिए ताकि छात्र किसी बेचे गए हसीन सपने को लेकर अपना करिअर शुरू में ही दिशाहीन न कर लें।

आखिर एक मजबूत राष्ट्र के लिए दक्ष एवं कौशल से भरपूर युवाओं की फौज एक बड़ी जरूरत है। और इस जरूरत में पॉलिटेक्निक संस्थान बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। हम यह आशा नहीं कर सकते कि भारत में रातों-रात रेनसेलर पोलिटेक्निक इंस्टिट्यूट,न्यूयॉर्क जैसे संस्थानों का निर्माण हो जाएगा। क्योंकि ऐसा करने के लिए हमें रॉबर्टरेसनिक जैसे महान शिक्षकों की जरूरत होगी। लेकिन यह तो है कि सिर्फ सरकार औरशिक्षक ठान लें, तो भविष्य में ये जरूर संभव हो सकता है। और इसकी शुरुआत उत्तर प्रदेश से हो सकती है|