• संवाददाता

पांच साल में कितनी बदली मोदी की काशी


वाराणसी 2014 में जब नरेंद्र मोदी ने वाराणसी से लोकसभा चुनाव लड़ने का फैसला किया था तब लोगों को आश्चर्य हुआ था क्योंकि वाराणसी हिंदुओं का तीर्थ होने के साथ यहां बड़ी संख्या में मुस्लिम भी रहते हैं। इस शहर की पहचान यहां के जरी और साड़ियों के कारोबार से भी है और बड़ी संख्या में जुलाहा परिवार रहते हैं। मोदी यहां 2014 में से चुनाव लड़े और 3.71 लाख से ज्यादा वोटों से जीत दर्ज की। मोदी को वाराणसी में 56 फीसदी से ज्यादा वोट मिले। पांच साल बाद अब लोग मोदी के कामों का हिसाब मांग रहे हैं। वाराणसी से सांसद होने के लिहाज से भी यहां उनके काम को लोग देख रहे हैं। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक मोदी के पीएम बनने के बाद से यहां निर्माण कार्यों में 21,862 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं। पहला बदलाव तो आपको एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही दिख जाएगा। यहां चार लेन का हाइवे बनाया गया है। इसके अलावा अब वाराणसी शहर में प्रवेश करना भी आसान हो गया है। टैक्सी ड्राइवर दिलीप शुक्ल के मुताबिक यहां रिंग रोड का पहले फेज का काम पूरा हो चुका है। अभी 17 किलोमीटर सड़क का निर्माण पूरा हुआ है और बाकी के 26 किलोमीटर के लिए काम चल रहा है। रिंग रोड से वाराणसी के आसपास के शहर और कस्बों में जाना आसान हो जाएगा। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, 'अच्छी सड़कों से वाराणसी एक कमर्शल हब बनकर उभर रहा है।' यहां टाटा और बीएचयू ने साथ मिलकर महामना पंडित मदन मोहन मालवीय कैंसर इंस्टिट्यूट बनाया है जो कि सिर्फ 10 महीने में तैयार हो गया। यहां के क्षेत्रीय लोगों के लिए यह वरदान है। यहां के पुराने रेलवे कैंसर हॉस्पिटल को होमी भाभा कैंसर हॉस्पिटल के रूप में विकसित किया गया है। यहां बनाया गया दीनदयाल हस्तकला संकुल एक म्यूजियम के साथ अवॉर्ड विजेता शिल्पकारों को अपना सामान बेचने का अवसर देता है। हालांकि यहां के दुकानदारों का कहना है कि अभी ग्राहकों की संख्या कम है और इसलिए बिक्री भी कम ही है। यहां तीन फ्लोर का म्यूजियम है जिसमें टेक्सटाइल्स, हैंडिक्राफ्ट्स की प्रदर्शनी के साथ उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की शहनाइयां रखी हैं। इसे 238 करोड़ी की लागत से बनाया गया है। यहां विदेशी पर्यटक भी खूब आ रहे हैं। इस साल औसत रूप से हर दिन लगभग 300 लोग इस म्यूजिमय को देखने आए। मंडुआडीह वाराणसी के चार रेलवे स्टेशनों में से एक है। यहां भी काफी काम कराया गया है। मार्बल का फर्श बनाया गया है और स्टील की सीट लगाई गई हैं। अब यह स्टेशन एयरपोर्ट की तरह दिखने लगा है। लाइटिंग अच्छी की गई है और यहां खड़ा एक पुराने जमाने का इंजन सेल्फी पॉइंट का काम कर रहा है। हालांकि यहां बिजली कटने की समस्या आम है। जब कैंटीन के मैनेजर लोकेश वर्मा से पूछा गया तो उन्होंने बताया कि तीन दिन से कैंटीन में बिजली नहीं है। इस साल फरवरी में दिल्ली से वाराणसी का सफर 8 घंटे में तय करने वाली वंदेभारत एक्सप्रेस चलाई गई। यह कई बार पत्थरबाजों का शिकार भी हो जाती है। यहां एक घरेलू वॉटर पोर्ट भी बनाया गया है। आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक यहां माल गांव का भी निर्माण हो रहा है। पहले बनारस एयरपोर्ट ज्यादा व्यस्त नहीं रहता था। पिछले सालों में कई बार यहां फ्लाइट बढ़ाई गई हैं। एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, 'अब यहां से चेन्नै, भुवनेश्वर, जयपुर, गुवाहाटी, सूरत और अन्य कई जगहों की भी फ्लाइट मिलती है।' 2013-14 में यहां यहां से सालाना 7.6 लाख लोग सफर करते थे जो अब बढ़कर 25 लाख तक पहुंच गए हैं। बनारस होटलअसोसिएशन के जनरल सेक्रटरी गोकुल शर्मा का कहना है, 'इस दौरान होटल में बुकिंग की संख्या डबल हो गई है और लगभग 150 नए होटल भी खुले हैं। बिजनस में 30 से 40 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है।' कहा जाता है कि वाराणसी गलियों और घाटों का शहर है। अब घाटों को लाइट्स से चमका दिया गया है। पहले यहां अंधेरा रहता था। अब लोग रात में भी दशाश्वमेघ घाट से अस्सी तक नाव का सफर कर सकते हैं। गंगा सेवा निधि के सेक्रटरी हनुमान यादव ने बताया, 'अब घाटों पर कूड़ेदान भी लगाए गए हैं और लोगों के व्यवहार में भी परिवर्तन हुआ है। लोग कूड़ा कचरा फेंकने के लिए डस्टबिन का प्रयोग करते हैं।' हालांकि उन्होंने कहा कि गंगा की सफाई अभी भी उतनी नहीं हो पाई है जितनी उम्मीद थी। 12 नावों के मालिक अजित साहनी ने कहा, 'नमामि गंगे लिए 20,000 करोड़ का प्रॉजेक्ट था लेकिन सफाई अभी उत्साहजनक नहीं है।' दिल्ली, मुंबई और चेन्नै से पर्यटकों को लाने वाले अबू अनीफा ट्रैवल के अब्दुल जलील ने बताया, 'पिछले कुछ साल में बिजनस 30 से 40 प्रतिशत बढ़ गया है।' साहनी ने बताया, 'घाटों पर लोगों की संख्या लगातार पढ़ रही है। लोगों की इनकम डबल हो गई है। मोदी शिंजो आबे और इमैनुअल मैक्रों के साथ घाट पर आए इससे लोगों की जिज्ञासा और ज्यादा बढ़ी है।' 2014 में जब हमारी टीम ने बनारस के लोगों से बात की थी लोगों ने बिजली को मुख्य समस्या बताया था। अब लोगों का कहना है कि पहले जहां 10 से 12 घंटे बिजली आती थी वहीं अब 22 से 23 घंटे बिजली आती है। कई दूसरे क्षेत्रों में भी बदलाव साफ नजर आता है। गोदौलिया चौक पर पहले चांदनी चौक की तरह बिजली के तारों का जाल बना रहता था जो कि अब साफ सुथरा नजर आता है। अब यहां तारों को अंडरग्राउंड कर दिया गया है। ट्रैफिक को नियंत्रित करने के लिए 173.53 करोड़ की लागत से एक कंट्रोल सेंटर बनाया गया है। हालांकि अभी ट्रैफिक में कोई बड़ा सुधार नजर नहीं आता है। शहर में कई जगहों पर गड्ढे खुदे हैं। पिछले साल मई में वाराणसी रेलवे स्टेशन के पास दो बीम गिरने की वजह से हुए हादस से फ्लाइओवर के निर्माण कार्य में देरी हो रही है। इस हादसे में 19 लोगों की मौत हो गई थी। 129 करोड़ की लागत से यह 2,261 मीटर लंबा फ्लाइओवर बनाया जा रहा है। 218 करोड़ की लागत से ट्रीटमेंट प्लांट बनने के बावजूद अभी सीवेज की समस्या में कमी नहीं आई है। अभी आधे ही घरों को सीवर लाइन से जोड़ा जा सका है। प्रयागराज की तरह वाराणसी में भी वॉल पेंटिंग के जरिए शहर को नया लुक दिया गया है। यहां डॉ. अब्दुल कलाम, भगत सिंह, जवाहरलाल नेहरू, प्रेमचंद की ईदगाह और जयशंकर प्रसाद की कामायनी को भी दीवारों पर उकेरा गया है। पेंटर मंजला चक्रवर्ती ने कहा, 'बड़ी मात्रा में धन खर्च किया गया है लेकिन वॉल पेंटिंग एकदम सही नहीं है। इसे सौंदर्यबोध के लिहाज से यह काम योजनागत तरीके से नहीं किया गया है।' इंडियन इंडस्ट्रीज असोसिएशन के वाराणसी चेयरमैन आरके चौधरी ने कहा, 'मोदी जी इतनी बार बनारस आए लेकिन उन्होंने उद्योगपतियों और व्यापारियों के साथ कभी बैठक नहीं की। यहां निवेश जीरो है और बेरोजगारी बहुत है।' यहां फैक्ट्री का एक पत्थर भी नहीं लगाया गया।' संकटमोचन मंदिर के महंत विश्वंभर नाथ मिश्र का कहना है कि बनारस की गलियों को तोड़ना यहां की आत्मा को मारने जैसा है। हालांकि आर्यन इंटरनैशनल स्कूल की डायरेक्टर सुबीन चोपड़ा का कहना है कि पांच साल में काशी बिल्कुल बदल गई है और अब यह ज्यादा जीवित नजर आती है। उन्होंने कहा कि वाराणसी में अभी बहुत सारा काम चल रहा है फिर भी काफी प्रगति हुई है। काशी विश्वनाथ मंदिर के आसपास बड़ी संख्या में घर थे और संकरी गलियां थीं। यहां वाहन से आना जाना संभव नहीं है। अब यहां पर पैदल यात्रियों के लिए कॉरिडोर बनाया जा रहा है जो 50 से 70 मीटर चौड़ा होगा और 330 मीटर लंबा होगा। यह विश्वनाथ मंदिर से सीधे मणिकर्णिका, जलसेन और ललिता घाट को जोड़ेगा। एक दलित परिवार का कहना है कि उन्होंने अपना दोमंडिला घर 24 लाख में बेच दिया। दिहाड़ी मजदूर स्यामू ने कहा, 'हमें इसलिए अपना घर बेचना पड़ा क्योंकि आसपास के घर गिराए जा रहे ते और इस वजह से हमारा घर भी गिर सकता था। यह बहुत मजबूत नहीं था।' विश्वनाथ धाम प्रॉजेक्ट एक महत्वाकांक्षी प्रॉजेक्ट है। इसके तहत वर्ल्ड क्लास हॉस्पिटल, ऑडिटोरियम, दुकानें और पार्क बनाए जाने हैं। प्रॉजेक्ट के एक अधिकारी ने बताया कि यह प्रॉजेक्ट 39,000 वर्ग मीटर में बनना है और पिछले महीने 88 फीसदी जमीन का अधिग्रहण पूरा हो गया है। इसके तहत 242 संपत्तियां खरीदी गई हैं और 212 घर गिराए जा चुके हैं। इस प्रॉसेस में 42 मंदिर ऐसे मिले हैं जो घरों के अंदर छिपे थे। वाराणसी विकास प्राधिकरण के सचिव विशाल सिंह ने कहा, 'सारा अधिग्रहण नए कानून के मुताबिक किया गया है और लोगों को दोगुनी कीमत दी गई है। यहां तक कि किराएदारों को भी 10 लाख रुपये तक मिले हैं।' बता दें कि पीएम मोदी ने कहा है कि यह प्रॉजेक्ट देश के दूसरे शहरों के लिए भी आदर्श बनेगा और काशी को नई पहचान देगा। बुनकर सऊद अहमद का कहना है कि सरकार ने केवल को-ऑपरेटिव्स को फायदा पहुंचाया है और वे अमीर हो गए हैं। जुलाहों का कहना है कि उन्हें कार्ड दिया जाए और उनका भुगतान सीधे बैंक अकाउंट में हो। बता दें कि पांच दशक पहले यहां जुलाहा कॉलोनी बसाई गई थी। यहां लगभग 100 परिवार रहते हैं। पुराने रेकॉर्ड के मुताबिक वाराणसी और आसपास के इलाके में लगभग 5 लाख जुलाहे रहते हैं। कारोबारियों का कहना है कि जीएसटी का भी कारोबार पर प्रभाव पड़ा है। पहले अनौपचारिक रूप से व्यापार होता था लेकिन अब रसीद के साथ व्यापार होता है। आसिफ का कहना है कि पुलवामा अटैक के बाद कुछ गुंडों ने पूछा, 'पाकिस्तान कब जाओगे?' व्यापारी परवेज अख्तर का कहना है कि उनका कारोबार पिछले कुछ महीने से बढ़ गया है लेकिन उन्हें भी साप्रदायिकता को लेकर चिंता है। उन्होंने कहा, 'बनारस बदलेगा नहीं, स्थानीय प्रशासन शांति के पूरे प्रयास करता है।'


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