• संवाददाता

आजम, अमर और जया प्रदा, तीन किरदार लड़ाई जोरदार


रामपुर उत्‍तर प्रदेश के सियासी रणभूमि पर में इस बार रामपुर की जंग बेहद खास होने वाली है। और हो भी क्‍यों नहीं, लड़ाई जो दो धुर विरोधियों के बीच है जो कभी एक-दूसरे के 'दोस्‍त' हुआ करते थे। लोकसभा चुनाव में महागठबंधन की ओर से समाजवादी पार्टी के दिग्‍गज नेता आजम खान मैदान में हैं वहीं बीजेपी ने उनके खिलाफ एसपी की ही पूर्व नेता और रामपुर से दो बार सांसद रह चुकीं जया प्रदा को मैदान में उतारा हैं। कभी अभिनेत्री जया प्रदा को रामपुर की सियासत का ककहरा सिखाने वाले आजम खान ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उन्‍हें अपने 'शिष्‍य' से ही चुनावी जंग लड़नी पड़ेगी। आजम की खान सरपरस्‍ती में पहली बार वर्ष 2004 में रामपुर से सांसद बनने वाली जया प्रदा अब साइकल छोड़ भगवा रंग में रंग चुकी हैं और उन्‍हें अमर सिंह का समर्थन हासिल है। हालांकि रामपुर की जंग में जीत के लिए इतना काफी नहीं है। वह भी तब जब उनका मुकाबला एसपी के 'किंग' आजम खान से है। आजम खान पिछले 40 वर्षों से रामपुर की सियासत का केंद्र बने हुए हैं। आजम नौ बार के विधायक हैं जबकि जयाप्रदा पिछले 5 वर्षों से सक्रिय राजनीति से दूर हैं। अब जया प्रदा के सामने आजम के गढ़ में 'कमल' खिलाने की चुनौती है। मुस्लिम बहुल इस सीट पर कांग्रेस पार्टी ने जयाप्रदा की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। कांग्रेस ने यहां पर बेगम नूरबानो जैसी दिग्‍गज नेता की जगह पर संजय कपूर को टिकट दिया है। इससे हिंदू वोटों का बंटवारा हो सकता है। दरअसल, लोकसभा चुनाव के ऐलान से पहले ही यह तय हो गया था कि बीजेपी रामपुर में अपना प्रत्‍याशी बदलेगी। पिछले आम चुनाव में बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ने वाले डॉक्‍टर नेपाल सिंह ने खराब सेहत का हवाला देकर चुनाव लड़ने से मना कर दिया था। वह अपने बेटे सौरभ पाल को टिकट दिलवाना चाहते थे लेकिन पार्टी को उनकी जीत पर भरोसा नहीं था। बीजेपी को तलाश एक ऐसे प्रत्‍याशी जो आजम खान जैसे कद्दावर नेता को चुनौती दे सके। इन सबके बीच बीजेपी ने स्‍थानीय स्‍तर पर सर्वे भी कराया जिसमें यह सामने आया कि आजम के इस 'किले' को केवल जया प्रदा ही ढहा सकती हैं। कहावत है कि लोहे की काट के लिए लोहे का इस्‍तेमाल किया जाता है। बीजेपी ने भी यही किया और जया प्रदा को रामपुर से उतार दिया। जया प्रदा ने 2009 के लोकसभा चुनाव में आजम खान के विरोध के बाद भी रामपुर में जीत दर्ज की थी। दरअसल, वर्ष 2004 में आजम खान ही जयाप्रदा को रामपुर की सियासत में लाए थे। आजम ने जया प्रदा के लिए वोट मांगे और उन्‍हें जीत मिली थी। इसके बाद आजम खान और जया प्रदा के बीच मतभेद पैदा हो गए। इस बीच जया प्रदा के समर्थन में उस समय मुलायम सिंह के बेहद करीबी रहे अमर सिंह चट्टान की तरह से खड़े हो गए। आजम के विरोध के बाद भी अमर सिंह की 'कृपा' से जया प्रदा को दोबारा रामपुर से टिकट मिला। आजम के विरोध के बाद भी जया प्रदा ने बीजेपी के वरिष्‍ठ नेता मुख्‍तार अब्‍बास नकवी को मात दी। इसके बाद आजम और अमर सिंह के बीच तल्‍खी बहुत ज्‍यादा बढ़ गई जो आजतक बरकरार है। इस दौरान जया प्रदा ने यह भी आरोप भी लगाया था कि आजम खान उनकी न्‍यूड फोटो लोगों को भेज रहे हैं। अब अमर सिंह के समर्थन से क्‍या जया प्रदा रामपुर फतह कर पाएंगी या नहीं, यह देखना बेहद दिलचस्‍प होगा। अगर रामपुर के जमीनी आंकड़ों पर गौर करें तो आजम खान का पलड़ा भारी दिखता है। वर्ष 2011 की जनसंख्‍या के मुताबिक रामपुर मुस्लिम बहुल जिला है। यहां की कुल आबादी 23,35,819 है। इसमें हिंदू 10,73,890 (45.97%) और मुस्लिम 11,81,337 (50.57%) हैं। हिंदू आबादी में भी 13.18 आबादी अनुसूचित जाति की है। एससी वोटर परंपरागत रूप से मायावती के साथ रहा है। एसपी-बीएसपी के बीच महागठबंधन के बाद ये वोटर आजम खान के साथ जा सकते हैं। हालांकि पिछले चुनाव में इनमें से बड़ी संख्‍या में मतदाताओं ने बीजेपी को वोट दिया था। वर्ष 2014 के आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि एसपी-बीएसपी के महागठबंधन और कांग्रेस के हिंदू प्रत्‍याशी उतार देने के बाद जया प्रदा के लिए आजम खान की चुनौती से पार पाना आसान नहीं होगा। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के नेपाल सिंह को 3,58,616 वोट, एसपी के नसीर अहमद को 3,35,181 वोट, कांग्रेस के नवाब काजिम अली खान को 1,56,466 वोट और बीएसपी के अकबर हुसैन को 81,006 वोट मिले थे। इस तरह से अगर एसपी और बीएसपी के वोट मिला दिए जाएं तो आजम आसानी से जीत सकते हैं लेकिन जयप्रदा भी उलटफेर में माहिर हैं।


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