• संवाददाता

कई लोकसभा सीटें ऐसी हैं, जहां कांग्रेस की स्थिति मजबूत दिख रही है


अहमदाबाद 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर पर सवार भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने गुजरात की सभी 26 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल की थी। अब पांच साल बाद केंद्र और राज्य में सत्ता पर काबिज बीजेपी के लिए अपने इस प्रदर्शन को दोहरा पाना एक बड़ी चुनौती बन गया है। गौरतलब है कि 2017 में हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने अपने प्रदर्शन में सुधार किया था इसलिए इस बार बीजेपी के लिए यह सब इतना आसान नहीं माना जा रहा है। 2017 के चुनाव में कांग्रेस को कुल 77 सीटें मिली थीं, जोकि पिछले तीन दशक में उसके लिए सबसे ज्यादा थीं। 2017 के चुनाव में हुई वोटिंग के विश्लेषण से पता चलता है कि गुजरात की 26 में से आठ लोकसभा सीटें ऐसी थीं, जहां कांग्रेस को बीजेपी से 14000 से लेकर 1.68 लाख वोट ज्यादा मिले। ये सीटें बनासकांठा, पाटन, मेहसाणा, साबरकांठा, सुरेंद्रनगर, जूनागढ़, अमरेली और आनंद हैं। इसको और आसान भाषा में बताएं तो इन आठ लोकसभा क्षेत्रों में आने वाली विधानसभाओं में कांग्रेस को भारतीय जनता पार्टी से ज्यादा वोट मिले थे। 2017 के चुनावों में जिन आठ लोकसभा सीटों पर कांग्रेस आगे चल रही थी, उनपर बीजेपी ने केवल दो मौजूदा सांसदों (अमेरली से नारन कचाड़िया और साबरकांठा से दीपसिंह राठौड़) को दोबारा टिकट दिया है। बाकी पांच सीटों के लिए अभी कैंडिडेट का ऐलान होना बाकी है जबकि सुरेंद्रनगर से नए कैंडिडेट को उतारा गया है। 2017 में हुए नुकसान को देखते हुए बीजेपी ने 2019 में स्थिति सुधारने की कोशिश की है। बीजेपी ने कांग्रेस के ओबीसी नेता कुंवरजी बावलिया को पार्टी में शामिल करा लिया है और उन्हें राज्य सरकार में कैबिनेट मंत्री का पद दिया है। बावलिया की एंट्री के साथ ही गुजरात में कांग्रेस टूटने लगी और एक के बाद एक कई नेता बीजेपी में शामिल हुए। बीजेपी की रणनीति स्पष्ट है कि जहां बीजेपी मजबूत नहीं है, वहां कांग्रेस के नेताओं और विधायकों को अपनी पार्टी में शामिल करा लिया जाए। इसी को ध्यान में रखते हुए बीजेपी ने अहीर समुदाय के नेता और कांग्रेस विधायक जवाहर चावड़ा को अपने पाले में मिला लिया। बता दें कि अहीर समुदाय चार लोकसभा सीटों पर निर्णायक स्थिति में है। इसके अलावा बीजेपी ओबीसी समुदाय के नेता और कांग्रेस से नाराज चल रहे विधायक अल्पेश ठाकोर को भी अपने पाले में करने की कोशिश कर रही थी। ठाकोर समुदाय भी उत्तरी गुजरात की चार लोकसभा सीटों पर निर्णायक भूमिका में हैं। हालांकि, बाद में अल्पेश ठाकोर ने स्पष्ट कर दिया कि वह कांग्रेस नहीं छोड़ने वाले हैं। गुजरात के प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष जीतू वघानी कहते हैं, 'लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनाव की तुलना नहीं की जा सकती है क्योंकि दोनों में मुद्दे अलग होते हैं। केंद्र सरकार के प्रदर्शन के कारण गुजरात के लोग नरेंद्र मोदी के नेतृत्व के लिए वोट करेंगे।' बीजेपी पहले की तरह ही पीएम मोदी के करिश्मे पर निर्भर है। बीजेपी का कहना है कि विकास और पुलवामा हमले के बाद एयर स्ट्राइक के मुद्दे पर नैरेटिव तैयार किया गया जाएगा। वहीं, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अहमद पटेल को पार्टी ने 2017 के प्रदर्शन को बनाए रखने के साथ-साथ सुधारने का भी काम दिया है। एक तरह कांग्रेस के गुजरात अध्यक्ष अमित चावड़ा आरोप लगा रहे हैं कि बीजेपी उनके विधायकों और नेताओं की खरीद फरोख्त कर रही है, दूसरी तरफ उनका यह भी दावा है कि पार्टी लोकसभा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करेगी। राज्य में 4 और 5 मार्च को हुई पीएम मोदी की रैली में पाटीदार समुदाय की उपस्थिति को देखते हुए बीजेपी को उम्मीद है कि 2015 से नाराज चल रहे पाटीदार उसके पक्ष में आएंगे।

बनासकांठा बनासकांठा में आने वाली सात विधानसभा सीटों में से कांग्रेस को पांच और बीजेपी को दो सीटें मिली थीं। बनासकांठा के डेयरी कारोबारी और किसान नर्मदा के पानी की उपलब्धता को लेकर नाराज बताए जा रहे हैं। इसके अलावा बेरोजगारी भी एक बड़ा मुद्दा है।

पाटन इन आठ सीटों में पाटन सीट भी है। पाटन में ही आने वाली वडगाम विधानसभा सीट से कांग्रेस समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार जिग्नेश मेवाणी ने चुनाव में जीत हासिल की थी। पाटन लोकसभा क्षेत्र में आने वाली सात विधानसभा सीटों में से कांग्रेस को चार और बीजेपी को तीन सीटों पर जीत मिली थी। इस इलाके में भी किसानों की समस्या, सिंचाई के लिए जल की समस्या और बाढ़ प्रभावित को मुआवजा ना मिलने का मुद्दा प्रभावी है।

मेहसाणा मेहसाणा लोकसभा क्षेत्र में कुल सात विधानसभा सीटें हैं, जिनमें से बीजेपी को चार और कांग्रेस को तीन पर जीत मिली थी। किसानों की समस्या के साथ-साथ पाटीदारों के आरक्षण का मुद्दा भी यहां प्रबल है।

साबरकांठा साबरकांठा में विधानसभा की कुल सात सीटें हैं, जिनमें से चार पर कांग्रेस और तीन पर बीजेपी को जीत मिली थी। यहां पर्याप्त स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था के अभाव के साथ-साथ रोजगार का मुद्दा प्रभावी है।

सुरेंद्रनगर सुरेंद्रनगर की सात सीटों में से कांग्रेस को छह और बीजेपी को एक सीट पर जीत मिली थी। पीने और सिंचाई के लिए नर्मदा नदी के पानी का ना मिलना भी एक मुद्दा है।

जूनागढ़ जूनागढ़ में विधानसभा की कुल सात सीटें हैं, जिसमें से सारी सीटों पर कांग्रेस को जीत मिली थी। यहां भी किसानों का मुद्दा सबसे अहम है। इसके अलावा आम की फसल के लिए सही नीति का ना होना भी सत्तारूढ़ पार्टी के लिए चुनौती बन सकती है।

अमरेली अमरेली की कुल सात विधानसभा सीटों में से बीजेपी को सिर्फ दो जबकि कांग्रेस को कुल पांच सीटों पर जीत मिली थी। किसानों की समस्या के साथ-साथ सूखे की समस्या भी यहां के लिए गंभीर मुद्दा है। यहां कई किसानों ने आत्महत्या भी की थी।

आनंद आनंद की सात विधानसभा सीटों में कांग्रेस को पांच और बीजेपी को दो सीटों पर जीत मिली थी। यहां के डेयरी किसानों का कहना है कि दूध के लिए उनको मिलने वाली कीमत पर्याप्त नहीं है। वहीं, तंबाकू किसान भी न्यूनतम समर्थन मूल्य की मांग कर रहे हैं और चुनावों का बहिष्कार करने की चेतावनी दी है।


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