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दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि सिर्फ निराशा तलाक का आधार नहीं हो सकता


नई दिल्ली दिल्ली हाई कोर्ट ने क्रूरता के आधार पर पति के फेवर में फैमिली कोर्ट द्वारा दिया तलाक की डिक्री को खारिज कर दिया है। हाई कोर्ट ने अपने अहम फैसले में कहा है कि क्रूरता साबित करना, क्रूरता को आधार बनाकर तलाक के लिए अपील दायर करने वाले याचिकाकर्ता (पति) की जिम्मेदारी है। लेकिन याची पति इस बात को साबित नहीं कर पाया। ऐसे मामले में प्रतिवादी लड़की की जिम्मेदारी नहीं है कि वह इस बात को साबित करे कि उसने क्रूरता नहीं की। मामले में पति का आरोप था कि उसकी पत्नी ने उसे नामर्द कहा था और उसके साथ क्रूरता की थी। इसी आधार पर फैमिली कोर्ट ने पति के फेवर में तलाक की डिक्री पारित की। लेकिन पत्नी ने हाई कोर्ट में फैमिली कोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी। हाई कोर्ट ने कहा कि सिर्फ यह कहना कि लड़की ने अपनी ड्यूटी नहीं निभाई, उसने गालीगलौज की, पति का अपमान किया- क्रूरता साबित नहीं करता। बल्कि इन आरोपों के सपॉर्ट में साक्ष्य की जरूरत है और बिना सबूत सिर्फ बयान से आरोप साबित नहीं होता। कोर्ट ने कहा कि पति का बयान था कि पहली बार मार्च 2009 में उसकी पत्नी ने उसे नामर्द कहा था। लेकिन जो तथ्य है, उसके हिसाब से दोनों 2013 तक साथ रहे थे। सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट का हवाला देते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि अगर कोई विशेष घटना शादीशुदा जिंदगी में कभी पहले हुई हो तो वह क्रूरता के दायरे में नहीं आएगा। क्योंकि दोनों पक्षकारों के बीच समझौतावादी व्यवहार के कारण उसे खत्म कर चुका होता है और इस तरह कोई भी पार्टी बाद में उसे क्रूरता का मामला नहीं बना सकता। कोर्ट ने कहा कि यह भी तयशुदा कानून है कि क्रूरता ऐसी होनी चाहिए कि साथ रहना असंभव हो। सिर्फ निराशा तलाक का आधार नहीं हो सकता। मौजूदा मामले में निचली अदालत (फैमिली कोर्ट) में पति ने क्रूरता के आधार पर तलाक मांगा था। निचली अदालत ने 5 अक्टूबर 2018 को पति के फेवर में तलाक की डिक्री पारित की थी। इस फैसले को महिला ने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। हाई कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को खारिज करते हुए तलाक की डिक्री को खारिज कर दिया।


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