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मसूद अजहर पर बैन के बीच चीन की दीवार से सोशल मीडिया में उबाल, क्या होना चाहिए चीनी सामानों का बहिष्क


नई दिल्ली पुलवामा आतंकी हमले के बाद आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर को ग्लोबल आतंकी घोषित करने के प्रस्ताव पर चीन ने एक बार फिर से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अड़ंगा लगा दिया है। यह चौथा मौका था, जब चीन ने वीटो पावर का इस्तेमाल कर प्रस्ताव को गिरा दिया। यह खबर सुनकर भारतीयों में चीन के खिलाफ उबाल आ गया है। यही वजह है कि सोशल मीडिया चीन से आयातित सामानों के बहिष्कार की अपील से पट गया है। ट्विट पर भी #BoycottChineseProducts टॉप ट्रेंड में शामिल है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या चीन को उसके प्रॉडक्ट्स का बहिष्कार कर सबक सिखाया जा सकता है? क्या चीनी सामानों का बहिष्कार भारत के लिए कहीं नुकसानदायक तो साबित नहीं होगा? इसका जवाब है कि चीन को सबक सिखाने में कोई बुराई नहीं है और इस दिशा में प्रयास भी किए जाने चाहिए, लेकिन इसके लिए चीनी सामानों के बहिष्कार का तरीका बहुत मुफीद नहीं है। आइए जानते हैं क्यों? कई भारतीयों की भ्रातियां हैं कि चीनी सामानों के बहिष्कार से चीन पर दबाव बनेगा। हालांकि, हकीकत यह है कि इससे फिलहाल भारत को ही नुकसान होगा जो चीन के उत्पादों पर निर्भर है। दरअसल, भारत, चीन को निर्यात कम जबकि उससे आयात ज्यादा करता है। चीन को भारत से मुख्य रूप से रॉ मटीरियल्स मिलते हैं तो भारत में चीन के खास तौर पर इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य बने-बनाए समानों की भारी मांग है। भारत का फार्मा सेक्टर बहुत हद तक चीनी आयातों पर निर्भर है जिनका इस्तेमाल दवाइयां बनाने में होता है। चीन के कुल निर्यात का महज 2 प्रतिशत ही भारत के पास आता है। इसलिए, अगर भारत में उसके सामानों का बहिष्कार होता भी है तो चीन पर फिलहाल कुछ खास असर नहीं होने वाला। हां, भारत का सबसे बड़ा ट्रेंडिंग पार्टनर चीन ही है। लेकिन, दोनों देशों के बीच व्यापार का पलड़ा चीन के पक्ष में बहुत ज्यादा झुका है। इसलिए, चीन के खिलाफ व्यापार युद्ध छेड़ कर भारत जीत की स्थिति में तभी आ सकता है जब यहां मैन्युफैक्चरिंग की क्षमता में बड़ी वृद्धि हो। इस दिशा में गंभीरता और दूर दृष्टि से काम हो तो भी वह क्षमता हासिल करने में हमें कम-से-कम एक दशक का वक्त लगेगा। अभी भारत हर साल 70 हजार करोड़ रुपये मूल्य का टेलिकॉम गीयर निर्यात करता है। इसका बड़ा हिस्सा हुवावे और जेडटीई जैसी चीनी कंपनियों से मिलता है। दरअसल, भारत में चीनी कंपनियों का दबदबा है। 8 अरब डॉलर (करीब 5.60 खरब रुपये) के भारतीय मोबाइल फोन मार्केट में 51 प्रतिशत पर अकेले श्याओमी, ओप्पो, वीवो और वनप्लस जैसी चीनी कंपनियां ही राज कर रही हैं। चीनी दबदबे का एक और बड़ा भारतीय मार्केट पावर सेक्टर का है। इस सेक्टर के लिए भारत चीनी आयातों पर निर्भर करता है। सिर्फ 12वीं योजना में करीब 30 प्रतिशत बिजली उत्पादन क्षमता चीन से आयात की गई। तेजी से फैल रहे सौर ऊर्जा क्षेत्र में अप्रैल 2016 से जनवरी 2017 के बीच चीन से 71 प्रतिशत सोलर इक्विपमेंट्स आयात किए गए। भारत का सोलर एनर्जी मार्केट 1.9 अरब डॉलर (करीब 1.30 खरब रुपये) का है। आम धारणा है कि चीन अपनी उपभोक्ता वस्तुएं भारत में डंप कर रहा है। लेकिन, असलियत में भारत कैपिटल गुड्स के लिए भी चीन पर ही निर्भर है। अगर चीन से कैपिटल गुड्स का आयात कम कर दिया जाए तो हमारी उत्पादन लागत बढ़ जाएगी और सामान महंगे हो जाएंगे। तो क्या इन आंकड़ों से यह मतलब निकाला जाए कि चीनी सामानों का बहिष्कार बिल्कुल बेकार आइडिया है? नहीं, इसका चीन पर अभी भले कोई असर नहीं होगा, लेकिन दीर्घावधि में उसे नुकसान उठाना पड़ सकता है। खासकर, चीन की छवि पर उस वक्त धब्बा लग रहा है जब वह अपने सामान बेचने के लिए अफ्रीका और यूरोप की ओर टकटकी लगा रहा है। भारत जैसे बड़े बाजार में चीनी सामानों के बहिष्कार के सामाजिक आंदोलन से चीन की आंतवाद को बर्दाश्त करने की क्षमता घटेगी क्योंकि वह दुनियाभर में एक जिम्मेदार महाशक्ति के रूप में अपनी छवि बनाने की कोशिश में जुटा है। चीन को कई अफ्रीकी देशों में वहां के नागरिकों के विरोध का सामना करना पड़ रहा है, जहां वह इन्फ्रस्ट्रक्चर प्रॉजेक्ट्स पर काम कर रहा है। ऐसे में चीन पर अधिनायकवादी और आतंकवादी देश के समर्थक का ठप्पा लगने से पश्चिमी देशों कारोबार बढ़ाने और अफ्रीका एवं यूरोप में जमीन मजबूत करने की उसकी क्षमता घटेगी। भारत में वक्त-वक्त पर चीनी सामानों के प्रति विरोध के स्वर मजबूत होने से चाहे-अनचाहे चीन को इस मोर्चे पर झटका तो लग ही रहा है।


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