• संवाददाता

यूपी की आधी से भी कम सीटों पर चुनाव लड़ रही एसपी, ऐसे पर अच्छे प्रदर्शन का दबाव


मेरठ समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव उर्फ टीपू के सामने 2019 लोकसभा चुनाव में गठबंधन के चलते यूपी की आधी से भी कम सीटों पर चुनाव लड़ने के चलते इस बार बड़ी फतह का दबाव भी होगा। 2014 में एसपी यूपी में पांच सीटों पर जीत दर्ज कर सकी थी। हालांकि, इस बार पार्टी को बीएसपी के साथ गठबंधन के बाद बेहतर परिणाम की उम्मीद है। दरअसल, पहले फेज की जिन आठ सीटों (मेरठ, बागपत, गौतमबुदधनगर, गाजियाबाद, बिजनौर, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, कौराना) पर चुनाव होना है, 2014 में इन सभी सीटों पर एसपी के उम्मीदवार मैदान में थे। हालांकि तब मोदी लहर और वेस्ट यूपी में उभरे स्थानीय समीकरणों के चलते कोई भी उम्मीदवार जीत दर्ज नहीं कर सका था। इस बार बीएसपी से गठबंधन के चलते आठ में से सिर्फ दो सीट कैराना और गाजियाबाद से एसपी चुनाव लड़ेगी। ऐसे में पार्टी अध्यक्ष अखिलेश पर दबाव रहेगा कि वह दोनो सीटें जीत सकें। कैराना पर सियासी जानकार गठबंधन की जमीन मजबूत आंक रहे हैं। ऐसा इसलिए भी है कि कैराना सीट पर गठबंधन उपचुनाव में जीत चुका है। दूसरे वहां एमएलए भी एसपी का ही है। उधर, गाजियाबाद सीट पर एसपी का मजबूत आधार नहीं रहा। वहां पार्टी को कड़ी मेहनत करनी होगी। एसपी के पास अपना कोई बड़ा चेहरा भी गाजियाबाद सीट पर फिलहाल तक नहीं है, यह कमजोर कड़ी साबित हो सकती है। गठबंधन में शामिल बीएसपी प्रमुख मायावती पर भी पहले फेज की आठ सीटों पर बड़ी जीत दर्ज करने की चुनौती रहेगी। इन आठ सीटों में ही मायावती की जन्मभूमि गौतमबुद्धनगर और कर्मभूमि सहारनपुर, बिजनौर और कैराना शामिल हैं। मायावती बिजनौर से पहली बार सांसद बनी थीं। सहारनपुर की हरौड़ा सीट से पहली बार विधायक बनीं। वहीं कैरना से एमपी का पहला चुनाव लड़ा। गौतमबुद्धनगर के बादलपुर में वह पैदा हुईं। यही नहीं गठबंधन में उनके पास आठ में से चार सीटें (गौतमबुद्धनगर, मेरठ, बिजनौर, सहारनपुर )भी हैं। इन चारों जगह से उनके सासंद पहले चुनावों में जीत चुके हैं


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