• संवाददाता

एसपी की 'दोस्ती' से बीएसपी को बड़ी कामयाबी की उम्मीद


मेरठ लोकसभा चुनाव 2019 से ठीक पहले उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच गठबंधन हुआ। इस गठबंधन के बाद बीएसपी सूबे में सिर्फ 38 सीटों पर चुनाव लड़ेगी, बावजूद इसके पार्टी को आस है कि उसका जनाधार बढ़ेगा। दरअसल, वेस्टर्न यूपी में मुस्लिम वोट बैंक को लेकर एसपी-बीएसपी के बीच हमेशा जंग के आसार बने रहते हैं। ऐसे में इस बार गठबंधन में साथ आने के बाद बीएसपी को उम्मीद है कि यहां उसे फायदा मिलेगा। बीएसपी के एक जोन को-ऑर्डिनेटर के मुताबिक, पार्टी ने दो बार 1993 में समाजवादी पार्टी और 1996 में कांग्रेस के साथ गठबंधन किया। उनका दावा है कि दोनों ही बार पार्टी को फायदा हुआ। उनका तर्क है कि बीएसपी को 1991 में अकेले चुनाव लड़ने पर 9.44 प्रतिशत वोट मिले थे लेकिन 1993 में एसपी के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ा, जिसका सीधा सियासी फायदा पार्टी को हुआ। उसके विधायकों की तादाद 12 से बढ़कर 67 हो गई। उसका वोट प्रतिशत भी 9.44 से बढ़कर 11.12 प्रतिशत हो गया।

'नहीं मिली एक भी सीट लेकिन वोट प्रतिशत बरकरार रहा' बीएसपी नेता के मुताबिक, 1995 में गेस्ट हाउस कांड के बाद एसपी से बीएसपी का गठबंधन टूट गया। उसके बाद 1996 के विधानसभा चुनाव में बीएसपी ने कांग्रेस से हाथ मिला लिया। नतीजा यह रहा कि बीएसपी की सीटें तो 1993 के बराबर 67 ही रहीं लेकिन वोट प्रतिशत बढ़कर 19.64 प्रतिशत हो गया। इस बढ़े जनाधार का फायदा पार्टी को यह मिला कि 2014 के लोकसभा चुनाव में बीएसपी को एक भी सीट नहीं मिली लेकिन पार्टी को वोट प्रतिशत 19.60 प्रतिशत पर ही बरकार रहा। इसी तरह 2017 में विधानसभा चुनाव में 19 सिर्फ सीटें जीतने वाली बीएसपी के 22.20 प्रतिशत वोट मिले।

'एसपी-बीएसपी की टक्कर में बीजेपी को फायदा' बीएसपी का मानना है कि गठबंधन में उसके दलित वोट को दूसरी पार्टी के समर्थक पक्का मानकर साथ खड़े हो जाते हैं। एसपी के साथ गठबंधन होने से वेस्टर्न यूपी में साइकल पर बटन दबाने वाला मुसलमान भी हाथी के साथ खड़ा दिखाई देगा। इससे एसपी और बीएसपी में मुस्लिमों का बंटवारा नहीं होगा, जिससे पार्टी प्रत्याशियों को फायदा मिलेगा। अभी तक देखने में आया है कि वेस्टर्न यूपी में अलग चुनाव लड़ने पर एसपी और बीएसपी में कांटे की टक्कर रहती है। ऐसी दशा में वोटों का बंटवारा होता हैं, जिसका सीधा फायदा बीजेपी को मिलता है। बीएसपी को दलितों का कोर वोट बैंक माना जाता है। 2011 की जनगणना के मुताबिक, सहारनपुर में 21.73, मुजफ्फरनगर मे 13.50, मेरठ में 18.44, बागपत में 10.98, गाजियाबाद में 18.4, गौतमबुद्धनगर में 21.73, बिजनौर में 20.94, बुलंदशहर में 20.21, अलीगढ़ में 21.20, आगरा में 21.78, मुरादाबाद में 15.86, बरेली में 12.65 प्रतिशत दलित हैं।


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