• सौरभ चटर्जी,लखनऊ

माया की 'छाया' में चले अखिलेश


लखनऊ मध्य प्रदेश में कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़ी बीएसपी की मुखिया मायावती ने बुधवार सुबह कांग्रेस को समर्थन देने का ऐलान कर दिया। इसके ठीक आधे घंटे बाद एसपी मुखिया अखिलेश यादव भी माया के नक्शे-कदम पर चलते दिखे। अखिलेश यादव ने भी ट्वीट कर अपने इकलौते विधायक का समर्थन कांग्रेस को देने का ऐलान कर दिया। माया की 'छाया' में चलते दिख रहे अखिलेश यादव इस फॉर्म्युले को गोरखपुर-फूलपुर लोकसभा चुनाव के बाद से ही अमल कर रहे हैं। पार्टी सूत्रों का कहना है कि अखिलेश किसी भी कीमत पर गठबंधन की राह में कोई रोड़ा नहीं चाहते, इसलिए वह नहीं चाहते कि उनका कोई भी कदम मायावती को किनारा कसने का मौका दे। गोरखपुर-फूलपुर में बीजेपी को हराया भले ही एसपी ने है, लेकिन तेवर और हौसले मायावती के बुलंद हैं। वजह यह थी कि जीत का पूरा श्रेय बीएसपी को देकर महागठबंधन की शर्तें तय करने का पूरा अधिकार एसपी मुखिया अखिलेश यादव ने मायावती के हाथों में रख दिया। इसका असर यह रहा कि 'दबाव की सियासत' में माहिर मायावती ने राज्यसभा चुनाव में रघुराज प्रताप सिंह ऊर्फ 'राजा भैया' और आरएलडी की भूमिका को लेकर अखिलेश यादव को अनुभवहीन करार दे दिया। इसके बाद से ही एसपी अमूमन हर बड़े सियासी फैसलों में इस समय मायावती की 'फॉलोअर' की ही भूमिका में नजर आ रही है।

इसलिए दबाव में है एसपी! 2014 में जीरो और 2017 में 19 सीटों पर सिमटने वाली बीएसपी के दिन बदलने में एसपी की ही अहम भूमिका रही। सूत्रों की मानें तो गोरखपुर में एसपी की जीत में बीएसपी के समर्थन से कहीं अधिक भूमिका स्थानीय मतदाताओं की नाराजगी व सही प्रत्याशी चयन की थी। हालांकि, पूरा क्रेडिट बीएसपी को गया और इसके साथ ही बीजेपी को हराने का एक 'अचूक' फॉर्म्युला भी ईजाद हो गया। इसके बाद दूसरे राज्यों के चुनाव खासकर कनार्टक में भी बीएसपी का खाता खुलना व विपक्षी एकता के मंचों पर मायावती को अधिक तवज्जो मिलना भी बीएसपी के पक्ष में गया। वहीं, अखिलेश यादव कम सीटें मिलने पर भी मायावती के साथ गठबंधन करने जैसे बयान देते रहे। राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी कांग्रेस के गठबंधन की पहली पसंद बीएसपी थी। मायावती के इंकार के बाद ही एसपी से चर्चा की कवायद आगे बढ़ी थी। इन चुनावों में भी बीएसपी का प्रदर्शन एसपी से कई गुना बेहतर रहा है। यही वजह है कि मायावती के हौसले बुलंद हैं और अब तक उन्होंने अपने पत्ते सार्वजनिक नहीं किए हैं। पार्टी सूत्रों का कहना है कि मायावती के अप्रत्याशित फैसले लेने की आदत से अखिलेश भी पूरी तरह से वाकिफ हैं। दूसरी ओर गठबंधन होने पर जीत के रास्ते आसान होते साफ दिख रहे हैं। इसलिए वह कोई ऐसा कदम नहीं उठाना चाहते, जिसे मायावती को अखिलेश पर ठीकरा फोड़ने का मौका मिल सके। इसलिए यूपी के बाहर की सियासत में भी अपने फैसलों की दिशा मायावती के ही अनुरूप रख रहे हैं। हालांकि, एसपी के अंदर इस नरमी को लेकर संशय भी है कि अगर मायावती ने कहीं 'झटका' दिया तो नरमी की यह रणनीति नुकसान कर जाए।

संयोग या समीकरण - मायावती ने कहा सम्मानजनक सीटें मिलने पर ही गठबंधन करेंगे। अखिलेश बोले, हम कम पर भी तैयार हैं। - मायावती कांग्रेस पर हमलावर होते हुए छत्तीसगढ़, राजस्थान व एमपी में गठबंधन से पीछे हटीं। इसके बाद अखिलेश के सुर भी कांग्रेस के खिलाफ हो गए। - चंद्रबाबू नायडू की सर्वदलीय बैठक में बीएसपी नहीं गई। इसके बाद एसपी ने भी बैठक से दूरी बना ली। - मायावती ने बुधवार की सुबह राजस्थान, मध्य प्रदेश में कांग्रेस के समर्थन का ऐलान किया। उसके आधे घंटे बाद ही अखिलेश का भी एमपी में समर्थन का ट्वीट आ गया।

साथ काम में वैचारिक तालमेल स्वाभाविक हमारा संभावित गठबंधन तो है ही। बस औपचारिक घोषणा होनी बाकी है। गोरखपुर-फूलपुर के नतीजों से यह साबित हो चुका है कि नरेंद्र मोदी और बीजेपी को केवल एसपी-बीएसपी ही रोक सकती है। अब हम साथ काम कर रहे हैं, तो वैचारिक तालमेल दिखना स्वाभाविक है। -सुनील सिंह यादव, एसपी एमएलसी व प्रवक्ता।


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