• संवाददाता

राजस्थान चुनाव: बीजेपी के गढ़ जोधपुर में जीत सकती है कांग्रेस ?


जोधपुर राजस्थान के सबसे बड़े शहर जोधपुर में सरकार बदलने के साथ ही लोगों का विश्वास भी बदल जाता है या यह सिर्फ एक सामान्य धारणा है। जब कांग्रेस की सत्ता प्रदेश में थी तो 15वीं शताब्दी का यह ऐतिहासिक शहर आकर्षण का केंद्र था। बीजेपी की सरकार आते ही जोधपुर को नजरअंदाज किए जाने के आरोप लगे। बता दें कि जोधपुर पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का गृह जनपद है और वह 1998 में यहां की सरदारपुरा विधानसभा सीट से विधायक रहे हैं। वह इस बार फिर यहां से चुनाव लड़ रहे हैं। जोधपुर को नजरअंदाज किए जाने की धारणा को सच भी माना जा सकता है। कांग्रेस के कार्यकाल में शहर के सबसे बड़ी सरकारी अस्पताल एमजी हॉस्पिटल में नए ओपीडी सेंटर का निर्माण शुरू हुआ था। बीजेपी की सरकार आने के बाद यह प्रॉजेक्ट बीते पांच साल से रुका है। जोधपुर में अधिकांश विकास कार्य इस साल तेज हुए लेकिन ये सारे विकास कार्य पूर्व कांग्रेस सरकार द्वारा स्वीकृत परियोजनाएं हैं। इस धारणा के बावजूद जोधपुर में बीजेपी की मजबूत पकड़ है। जोधपुर की सभी विधानसभा सीटों पर 1998 को छोड़कर बीजेपी 1985 से लगातार जीतती आई है। सीमांकन के बाद बनाए गए सूरसागर में 2008 के बाद से लगातार बीजेपी के विधायक रहे हैं। गहलोत खुद कई बार इस बात पर निराशा जता चुके हैं कि कांग्रेस जोधपुर और सूरसागर में नहीं जीत पाती है। 2013 में बीजेपी को सदरपुरा सीट छोड़कर जोधपुर की 10 सीटों में से 9 सीटों पर जीत मिली थी। 2008 में कांग्रेस वापस सत्ता में आई, तब बीजेपी को दस सीटों में से छह पर जीत हासिल हुई थी। इस बार कांग्रेस के दस उम्मीदवारों में से सात उम्मीदवार ऐसे हैं जो पहली बार चुनाव लड़ रहे हैं। इन सात उम्मीदवारों में से तीन कांग्रेस परिवार के हैं। दिव्या मदेरणा ओसियां सीट से चुनाव लड़ रही हैं। वह महिपाल मदेरणा की बेटी और परसराम मदेरणा की पोती हैं। वहीं लूणी विधानसभा से कांग्रेस के उम्मीदवार महेंद्र बिश्नोई मलखान सिंह के बेटे और राम सिंह बिश्नोई के पोते हैं। महिपाल मदेरणा और मलखान सिंह की भंवरी देवी केस में बहुत बदनामी हुई थी। दोनों इस मामले में जेल भी गए थे। हालांकि इसे अब अतीत की बात माना जा रहा है। कांग्रेस नेता खेत सिंह राठौड़ की बहू मीना कंवर शेरगढ़ से चुनाव लड़ रही हैं। कई लोग मानते हैं कि जिले में राजनीतिक लड़ाई लोगों की मांगों और जरूरतों पर भारी पड़ गई है। स्थानीय उद्योगों में पत्थर की खदान, हस्तशिल्प, इस्पात, गौर प्रसंस्करण और कुछ हद तक वस्त्र शामिल हैं और ये सभी बेहतर सुविधाओं और अवसरों के लिए रो रहे हैं। शहर में पढ़ती हुई आबादी का सबसे बड़ा कारण पत्थर की खदानें हैं लेकिन इस मुद्दे को नजरअंदाज किया जा रहा है। इस क्षेत्र के किसानों ने अच्छे न्यूनतम समर्थन मूल्यों, फसलों की सरकारी खरीद और सिंचाई के पानी की मांग को लेकर कई बार आंदोलन किए हैं। यह रेतीला शहर है इसलिए यहां पीने के पानी की बहुत बड़ी समस्या है। इसके अलावा लूणी और शेरगढ़ जैसे निर्वाचन क्षेत्रों में भी पानी के लिए कई आंदोलन हो चुके हैं। यहां पर दस विधायकों में से दो राजपूत और दो जाट समुदाय के हैं। एक माली, ब्राह्मण, बिश्नोई और पटेल समुदाय के हैं। वहीं दो विधायक अनुसूचित जाति के हैं।


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