• संवाददाता

काशी विश्वनाथ कॉरिडोर निर्माण के विरोध में उतरी ज्ञानवापी मस्जिद की मेंटनेंस कमिटी


वाराणसी काशी विश्‍वनाथ कॉरिडोर बनाने के लिए मंदिरों को तोड़े जाने और भवनों के अधिग्रहण को लेकर विरोध के बाद अब सुप्रीम कोर्ट का करीब 25 साल पुराना एक आदेश आड़े आ रहा है। विश्‍वनाथ मंदिर से सटी ज्ञानवापी मस्जिद की देखरेख करने वाली कमिटी अंजुमन इंतजामिया मसाजिद ने कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए मस्‍जिद के पास के भवनों के ध्वस्तीकरण और नए निर्माण का विरोध किया है। कमिटी के सदस्यों ने इस बारे में कहा, प्रशासन सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना कर रहा है। उनकी नहीं सुनी तो फिर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे। दरअसल, ज्ञानवापी मस्जिद को लेकर स्‍थानीय कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक कई मुकदमे चल चुके हैं। अयोध्‍या में बाबरी विध्‍वंस के बाद सुप्रीम कोर्ट के आदेश से काशी विश्‍वनाथ मंदिर समेत पूरे ज्ञानवापी परिसर की सुरक्षा केंद्रीय एजेंसियों के जिम्‍मे है। इन दिनों इसी एरिया में वाराणसी के सांसद व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ड्रीम प्रॉजेक्‍ट विश्‍वनाथ कॉरिडोर का काम तेजी पर है। विस्‍तार के लिए खरीदे गए भवनों के ध्‍वस्‍तीकरण के दौरान ज्ञानवापी मस्जिद के पीछे के हिस्‍से की तरफ मंदिर का नया प्रवेश द्वार सामने आने से विवाद खड़ा हुआ है।

फिलहाल जिला प्रशासन ने रोका काम एक तरफ जहां मंदिर प्रशासन का कहना है कि करीब 200 साल बाद सामने आए नए प्रवेश द्वार से आने वाले समय में श्रद्धालुओं को काफी राहत होगी। वहीं, अंजुमन इंतजामिया मसाजिद ने मस्जिद के पास की जा रही तोड़फोड़ को सुप्रीम कोर्ट के 1992 से लेकर 1997 तक में दिए गए फैसलों का खुला उल्‍लंघन और इससे मस्जिद-मंदिर, दोनों के लिए खतरा बताया है। फिलहाल तोड़फोड़ रोक दी गई है, लेकिन मंदिर या जिला प्रशासन का कोई अधिकारी इस बारे में बोलने को तैयार नहीं है।

समझौते में सभी पक्षों की अनुमति लेने की बात अंजुमन इंतजामिया मसाजिद के जॉइंट सेक्रेटरी एस.एम. यासीन का कहना है कि मो. असलम उर्फ घूरे की ओर से दायर याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने यथास्थिति बनाए रखने के साथ पुख्‍ता सुरक्षा के इंतजाम करने के आदेश दिए हैं। फैसले में यह भी कहा गया है कि इस बारे में किसी तरह की भ्रम की स्थिति या फिर दिशा-निर्देश को लेकर पक्षों के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खुला रहेगा। वाराणसी की स्‍थानीय कोर्ट में अंग्रेजी हुकूमत के दौर में चले सिविल सूट में फैसला ज्ञानवापी मस्जिद के पक्ष में रहा था। इसके बाद 1954 में हुए त्रिपक्षीय समझौते में इस बात का साफ जिक्र है कि ज्ञानवापी कैंपस में कोई भी निर्माण या नया काम पक्षों की सहमति के बगैर नहीं हो सकेगा। यह समझौता तत्‍कालीन सिटी मजिस्‍ट्रेट गौरी शंकर सिंह, अंजुमन इंतजामिया मसाजिद और हिन्‍दू पक्ष की ओर से व्‍यास पीठ के बीच हुआ था।

डीएम की गाइडलाइन में प्रवेश द्वारों का उल्लेख वर्ष 1993 में तत्‍कालीन डीएम की ओर से जारी गाइड लाइन में मंदिर के प्रवेश द्वारों का भी स्‍पष्‍ट उल्‍लेख है। अंजुमन इंतजामिया का आरोप है कि वर्तमान प्रशासन इन सभी तथ्‍यों को दरकिनार कर मनमानी करने पर अड़ा हुआ है। वहीं मुफ्ती-ए-बनारस मौलाना अब्दुल बातिन कहा कहना है कि ज्ञानवापी मस्जिद के आसपास तोड़फोड़ और निर्माण का फैसले कोर्ट के निर्णय की अवहेलना है। मौलाना बातिन का कहना है कि नया रास्ता खोले जाने से मंदिर और मस्जिद दोनों के अस्तित्व पर खतरा पैदा हुआ है। वहीं अंजुमन इंतजामिया मसाजिद के अध्यक्ष मौलाना अब्दुल बाकी ने कहा कि हमारी लगातार यह कोशिश रही है कि प्रशासन कोर्ट के फैसले और तथ्य को समझे और इसी के अनुसार काम भी करे। उन्होंने कहा कि तमाम तर्कों के बाद भी अगर प्रशासन इसे नहीं समझता है तो हमारे पास सुप्रीम कोर्ट जाने का रास्ता खुला हुआ है।


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