• संवाददाता

क्या 35ए के नाम पर जम्मू-कश्मीर में महागठबंधन बनाएंगे फारूक और महबूबा ?


श्रीनगर जम्मू-कश्मीर में पंचायत और स्थानीय निकाय चुनाव को लेकर प्रचार अभियान जोरों पर है। अक्टूबर और नवंबर में जम्मू-कश्मीर एक बार फिर लोकतंत्रात्मक व्यवस्था के एक बड़े पर्व को मनाने जा रहा है। एक ओर जहां बीजेपी इन चुनावों में घाटी की तमाम सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने में जुटी हुई है, वहीं राज्य में कश्मीर केंद्रित तमाम पार्टियों ने अनुच्छेद 35ए के नाम पर चुनाव का बहिष्कार कर घाटी के लोगों में अपनी वफादारी साबित करने का प्रयास किया है। राज्य में इस बार पंचायत का यह चुनाव करीब 13 साल के बाद हो रहा है। इन चुनावों में बीजेपी उत्साहित है, कांग्रेस तटस्थ तो नैशनल कॉन्फ्रेंस समेत पीडीपी मैदान से बाहर है, लेकिन चुनाव के मैदान के बाहर प्रदेश की दोनों बड़ी पार्टियां अब 35ए के मुद्दे पर संयुक्त रूप से एक साथ दिख रही हैं। पिछले कुछ दिनों में पहले फारूक अब्दुल्ला और फिर महबूबा मुफ्ती ने जिस तरह 35ए के मुद्दे पर चुनाव के बहिष्कार का ऐलान किया है, वह यह दिखाता है कि राज्य में धुर विरोधी होने के बावजूद दोनों पार्टियां 35ए के मुद्दे पर एक स्टैंड पर कायम हैं। राज्य में पंचायत चुनाव के बहिष्कार का ऐलान करते हुए फारूक अब्दुल्ला ने कहा था, 'जब तक केंद्र सरकार अनुच्छेद 35ए को लेकर अपना रुख साफ नहीं कर देती तब तक पार्टी पंचायत चुनाव में भाग नहीं लेगी।' इस ऐलान के दो रोज बाद केंद्र को चेतावनी देते हुए फारूक ने यह भी कहा था कि अगर सरकार 35ए पर अपना रुख स्पष्ट नहीं करती तो आगामी विधानसभा और लोकसभा चुनाव का बहिष्कार किया जाएगा। इस बयान के तीन रोज बाद महबूबा मुफ्ती ने भी चुनाव का बहिष्कार करते हुए कहा कि जब तक केंद्र सरकार अनुच्छेद 35ए को लेकर अपना रुख साफ नहीं कर देती तब तक पार्टी पंचायत चुनाव में भाग नहीं लेगी। इस दौरान महबूबा ने यह भी कहा वह अंतिम सांस तक जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को बनाए रखने की लड़ाई लड़ेंगी, क्योंकि अनुच्छेद 35ए के तहत मिला विशेष दर्जा राज्य के हर व्यक्ति के जीवन से जुड़ा विषय है। हालांकि, दोनों राजनीतिक पार्टियों के बहिष्कार का ऐलान करने के बावजूद सरकार ने पंचायत चुनाव के प्रस्तावित कार्यक्रम में कोई फेरबदल नहीं किया।

पीडीपी के विश्वासपात्र अल्ताफ बुखारी ने बनाया प्लान वहीं इस पूरे घटनाक्रम के 20 दिन बाद बुधवार को श्रीनगर में मीडिया से बात करते हुए पीडीपी के वरिष्ठ नेता अल्ताफ बुखारी ने अपने बयान में कहा कि नैशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी को एक साथ आकर जम्मू-कश्मीर में सरकार बनाने का दावा करना चाहिए। बुखारी ने यह भी कहा कि राज्य की पहचान पर आते खतरों को देखते हुए दोनों पार्टियों को साथ आकर सरकार बनानी चाहिए। इसके अलावा आगामी चुनाव में भी साथ उतरना चाहिए। जिन अल्ताफ बुखारी ने यह बयान दिया, वह पीडीपी के संस्थापक मुफ्ती मोहम्मद सईद के वक्त से ही पार्टी के अति विश्वासपात्रों की श्रेणी में रखे जाते रहे हैं।

मुफ्ती मोहम्मद से महबूबा के खास रहे हैं अल्ताफ मुफ्ती मोहम्मद सईद की सरकार में लोक निर्माण विभाग और महबूबा मुफ्ती की सरकार में वित्त और स्कूली शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण विभागों के मंत्री रहे बुखारी पीडीपी के थिंक टैंक के रूप में जाने जाते हैं। साथ ही पीडीपी-बीजेपी सरकार के दो सबसे बड़े मंत्रियों हसीब द्राबू और नईम अख्तर को पद से हटाने के बाद महबूबा ने आलोचना झेल रहे इनके विभागों को भी अल्ताफ बुखारी को ही सौंंपा था। इसके बावजूद भी भले ही पार्टियां इस मशविरे को बुखारी की निजी राय बताएं, लेकिन यह भी हो सकता है कि दूरगामी परीस्थितियों में देश के अन्य हिस्सों की तरह जम्मू-कश्मीर में भी 35ए के संयुक्त मुद्दे पर राज्य की पार्टियां गठबंधन पर विचार कर ही लें।

..तो 15 अगस्त को ही तय हुई थी बहिष्कार की नीति सियासी जानकारों का मानना है कि 15 अगस्त को श्रीनगर के शेर-ए-कश्मीर स्टेडियम में जब महबूबा मुफ्ती और उमर अब्दुल्ला स्वतंत्रता दिवस समारोह में हिस्सा लेने पहुंचे थे, उसी वक्त राज्य में पंचायत चुनाव के संयुक्त बहिष्कार का प्लान बना लिया गया था, लेकिन इस घटना के 20 दिन बाद तक पार्टी के अलग-अलग फोरम पर मंथन होने के बाद फारूक और महबूबा ने अलग-अलग बहिष्कार की घोषणा की।

मतदान का प्रतिशत कर सकता है फैसला माना जा रहा है कि अगर राज्य में महबूबा मुफ्ती और नैशनल कॉन्फ्रेंस के स्टैंड के साथ आम वोटर भी पंचायत और निकाय चुनाव के मतदान में खास रुचि नहीं लेता है, तो इसके दूरगामी परिणाम हो सकेंगे। वहीं मतदान का बहिष्कार करने वाला वोटर परोक्ष रुप से ही बीजेपी-कांग्रेस के खिलाफ होगा। ऐसे में इन्हें जम्मू और कश्मीर संभाग में एक साथ लाकर अपनी ताकत साबित करने और 35ए को बचाने के नाम पर एनसी-पीडीपी महागठबंधन का रास्ता भी अपनाने पर विचार कर सकेंगी। बड़ी बात यह कि अगर ऐसा होता है, तो जम्मू-कश्मीर की सियासत में पहली बार केंद्र के किसी फैसले पर एक बड़ा संयुक्त मोर्चा खड़ा हो जाएगा, जिसे लेकर एक दबाव की स्थिति तो जरूर ही बनेगी। हां, यह जरूर है कि यह महागठबंधन बहुत अधिक वक्त तक एक साथ रहे इसकी संभावना अंश मात्र ही दिखती है।


0 व्यूज

                                           KarmKasauti

                            Kanpur Uttar Pradesh

          Email: karmkasauti@gmail.com

   Copyright 2018. All Rights Reserved.