• संवाददाता, दिल्ली

जस्टिस इंदू मल्होत्रा ने क्यों किया विरोध, सबरीमाला मंदिर में अब सभी महिलाओं की एंट्री


नई दिल्ली सबरीमाला मंदिर में अब किसी भी एज ग्रुप की महिलाओं को एंट्री से नहीं रोका जा सकेगा। सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में हर उम्र वर्ग की महिलाओं के मंदिर में प्रवेश का रास्ता खोल दिया है। सुप्रीम कोर्ट की 5 सदस्यों की संवैधानिक बेंच ने 4-1 के बहुमत से फैसला सुनाया। जस्टिस इंदू मल्होत्रा ने बहुमत से अलग फैसला दिया। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के नेतृत्व में पांच जजों की बेंच में जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस नरीमन, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदू मल्होत्रा शामिल रहीं। इस फैसले का एक रोचक पहलू यह रहा है कि पांच जजों की बेंच के चार पुरुष सदस्यों ने जहां महिलाओं की एंट्री के पक्ष में फैसला सुनाया, वहीं महिला जज इंदू मल्होत्रा ने असहमति दिखाई। जस्टिस इंदू मल्होत्रा: महिला जज ने कहा कि इस मामला का सभी धर्मों पर व्यापक असर है। देश में धर्मनिरपेक्ष माहौल को बनाए रखने के लिए गहरे धार्मिक मामलों से छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए। जस्टिस इंदू मल्होत्रा ने कहा कि यहां बराबरी का अधिकार, धर्म के पालन के अधिकार से कुछ टकराव के साथ सामने आ रहा है, जो कि खुद एक मूलभूत अधिकार है। जस्टिस मल्होत्रा ने तर्क दिया कि भारत में विविध धार्मिक प्रथाएं हैं। संविधान सभी को अपने धर्म के प्रचार करने और अभ्यास करने की अनुमति देता है। ऐसे में अदालतों को इस तरह की धार्मिक प्रथाओं में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए भले ही यह भेदभावपूर्ण क्यों न हो। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा और जस्टिस खानविलकर: दोनों जजों ने महिलओं के एंट्री के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा कि भगवान अयप्पा के भक्त हिंदू हैं, ऐसे में एक अलग धार्मिक संप्रदाय न बनाएं। चीफ जस्टिस ने कहा कि धर्म जीवन जीने का तरीका है जो जीवन को आध्यात्म से जोड़ता है। सीजेआई ने कहा कि पितृसत्तात्मक धारणा को भक्ति में समानता को कम करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। चीफ जस्टिस और जस्टिस खानविलकर ने कहा कि पूजा में लैंगिक भेदभाव नहीं चल सकता। जस्टिस नरीमन: जज ने कहा कि सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 साल तक की महिलाओं के प्रवेश पर रोक की परंपरा संविधान के अनुच्छेद 26 के अनुकूल नहीं है। पूजापाठ में महिलाओं का भी बराबर का अधिकार है। जस्टिस नरीमन ने कहा कि सारे आयु वर्ग वाले भगवान अयप्पा के भक्त हैं और लिंग मंदिर में प्रवेश से रोकने का आधार नहीं हो सकता। जस्टिस चंद्रचूड़: जज ने कहा कि अगर किसी धार्मिक परंपरा शरीर की वजह से महिलाओं को प्रवेश से रोक उनकी गरिमा का उल्लंघन करती है तो वह असंवैधानिक है। जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि माहवारी की वजह से महिलाओं पर प्रतिबंध लगाना पूरी तरह से असंवैधानिक है। उन्होंने कहा कि अदालतों को उन धार्मिक प्रथाओं को वैधता प्रदान नहीं करनी चाहिए जो महिलाओं को अपमानित करती हैं।


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