• Umesh Singh,Delhi

देना, विजया और बैंक ऑफ बड़ौदा के विलय से एनपीए का सही इलाज कर रही है सरकार?


नई दिल्ली अगस्त 2017 में सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के 21 बैंकों को एकीकरण की अपनी-अपनी योजना पेश करने को कहा था। अब बैंक ऑफ बड़ौदा, विजया बैंक और देना बैंक के प्रस्तावित विलय पर सोशल मीडिया चुटकी लेते हुए नए बैंक को विजय देनानाथ बड़ौदा बैंक का नाम दे रहा है। लेकिन, सरकार ने इस विलय का ऐलान करते हुए छोटे-छोटे बैंकों को मिलाकर वैश्विक स्तर के कुछ बैंक बनाने की दिशा में एक और ठोस कदम बढ़ा दिया। इस विलय से सरकारी बैंकों की संख्या 21 से घटकर 19 रह जाएगी। हालांकि, देना बैंक की खराब सेहत को लेकर इस प्रस्तावित विलय पर सवाल भी उठ रहे हैं। खुद पर फंसे कर्ज (एनपीए) के बड़े बोझ के कारण देना बैंक अभी रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) के प्रॉम्प्ट करेक्टिव ऐक्शन (पीसीए) के दायरे में है। इसी वजह से इस बैंक पर अब कोई कर्ज देने को लेकर पाबंदी लगी हुई है। सरकार का मानना है कि विलय के बाद इन बैंकों की संचालन क्षमता सुधरेगी, लागत में कटौती आएगी और नया बैंक मौजूदा कई प्रतिस्पर्धी बैंकों को मात दे सकेगा। हालांकि, कई लोग इस विलय को सुधारात्मकम कदम से ज्यादा मजबूरी मानते हैं। उनके मुताबिक, इस विलय के पीछे देना बैंक को प्रभावी तौर पर बेल आउट देना है जिसके कर्मचारियों और फंसे कर्जों के बोझ का असर नए बैंक पर भी पड़ेगा। विलय से वास्तविक समस्या छिप जाएगी, इसका समाधान नहीं हो पाएगा।

विलय पर सहमत नहीं होते रघुराम राजन पूर्व आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन ने सरकारी बैंकों के विलय की मंशा पर कई बार सवाल उठाए थे। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया था कि बैंकों का एकीकरण फालतू नहीं है, लेकिन सरकार की समझ साफ होनी चाहिए कि आखिर इससे वह कौन सा मकसद हासिल करना चाहती है। जनवरी 2014 में एक लेक्चर के दौरान उन्होंने सवाल उठाया था, 'किसक किसके साथ विलय होगा, इसका निर्णय करते वक्त बहुत सावधान रहने की जरूरत है। सर्वोत्तम तो यह होगा कि मजबूत बैंकों का विलय कर दिया जाए क्योंकि उनके पास संसाधन हैं, उनकी सेहत और संस्कृति अच्छी है एवं उनके सामने विलय प्रक्रिया की जरूरतों को पूरा करने के सिवा कोई बाधा नहीं है।'

उन्होंने आगे कहा कि अगर हमने किसी बीमार बैंक का विलय किसी बड़े स्वस्थ बैंक के साथ कर दिया तो इससे विलय के वक्त बड़े स्वस्थ बैंक के लिए समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। देना बैंक की मौजूदा स्थिति विलय के बाद बने नए बैंक की क्षमता को भी प्रभावित करेगी। इससे राजन की मान्यता को बल मिलता है।

राजन ने कमजोर या बीमार बैंकों का विलय तभी करने की सलाह दी थी जब उनकी सेहत सुधर जाए। उन्होंने बैंकों के विलय में सरकार की मुख्य भूमिका पर भी सवाल उठाया था। अब यही हो रहा है। ईटी को सूत्रों से पता चला है कि जब सोमवार को तीनों बैंकों के टॉप एग्जिक्युटिव्स को मीटिंग के लिए दिल्ली बुलाया गया था, तो उन्हें इसका तनिक आभास नहीं था कि होने क्या जा रहा है। एक बैंक ने ईटी को बताया, 'अगर हम पर और हमारे बोर्ड पर छोड़ दिया जाता तो हम बैंकों के इस कॉम्बिनेशन को पसंद नहीं करते। अब जब यह सरकार का फैसला है तो हमारे पास इसे मानने के सिवा कोई विकल्प नहीं है।' now dena vijaya and bob to be merged तीन और सरकारी बैंकों का होगा विलय

एकीकरण के जोखिम तीनों बैंकों की शाखाओं के एकीकरण और इसकी प्रक्रिया विलय की बड़ी चुनौती होगी। ब्रोकिंग हाउस जेफरीज के मुताबिक, इन बैंकों की कई शाखाएं एक ही जगह पर काम कर रही हैं। अगर इनमें कुछ शाखाएं बंद होंगी तो कर्मचारियों के समायोजन का सवाल पैदा होगा। इसके अलावा, तीनों बैंकों की अलग-अलग कार्य प्रणाली है। एनपीए को बोझ तले दबे देना बैंक में शासन-प्रशासन की गंभीर समस्याएं होंगी।

फंसे कर्ज (NPAs) इस विलय से देना बैंक का फंसा कर्ज नए बैंक के खाते में आ जाएगा। देना बैंक का ग्रॉस एनपीए रेशियो 22 प्रतिशत के सर्वोच्च स्तर में है। विजया बैंक का ग्रॉस एनपीए रेशियो 6.9 प्रतिशत है जबकि बैंक बड़ौदा का 12.4 प्रतिशत। इनके विलय से बने नए बैंक का ग्रॉस एनपीए रेशियो 13 प्रतिशत हो जाएगा जो बैंक ऑफ बड़ौदा के मोजूदा 12.4 प्रतिशत के रेशियो से खराब होगा। इसलिए, इस विलय को दो बैंकों के जरिए एक बैंक के बेल आउट के रूप में देखा जा रहा है।

एकीकरण वित्त मंत्री अरुण जेटली ने सोमवार को आश्वासन दिया था कि न किसी की नौकरी जाएगी और न ही किसी की सेवा-शर्तों से छेड़छाड़ होगा। हालांकि, ऑल इंडिया बैंक एंप्लॉयीज असोसिएशन (एआईबीईए) ने विलय के फैसले का विरोध किया है। उसका कहना है कि ऐसा कोई सबूत नहीं है कि बैंकों के विलय से बनने वाला नया बैंक ज्यादा कुशल और क्षमतावान होता है। असोसिएशन के महासचिव सी. एच. वेंकटचलम का कहना है कि विलय से बैंक शाखाएं बंद हुई हैं, बैड लोन बढ़े हैं, स्टाफ की संख्या में कटौती हुई और बिजनस भी घटा है। उन्होंने कहा, 'स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) 200 साल में पहली बार नुकसान में गया है।' उन्होंने कहते हैं, 'बैंक ऑफ बड़ौदा, देना बैंक और विजया बैंक का कुल फंसा हुआ कर्ज 80,000 करोड़ रुपये है। इनके विलय से इन फंसे कर्जों की वसूली नहीं हो जाएगी। दूसरी ओर, पूरा ध्यान विलय के मुद्दे पर चला जाएगा और यही सरकार का गेम प्लान है।'

क्या है भविष्य? सरकार मानती है कि तीनों बैंकों के विलय से संचालन सहभागिता पैदा होगी और छोटे-छोटे बैंकों की जगह बड़े दमदार बैंक उभरेंगे। लेकिन, कई लोगों को लगता है कि विलय के बाद बड़े बीमार बैंक पैदा होंगे। रेटिंग एजेंसी नोमुरा ने एक नोट में कहा, 'हम बताना चाहते हैं कि इन बैकों (देना बैंक और विजया बैंक) का एनपीए कवरेज बैंक ऑफ बड़ौदा से बहुत कम है और विलय के बाद एनपीए की पहचान में अनिश्चितता पैदा होगी। यह अनिश्चितता, ज्यादा प्रविजनिंग और संभावित B/S कंसॉलिडेशन से बैंक ऑफ बड़ौदा को तुरंत झटका लगेगा।' हालांकि, एडलवाइस सिक्यॉरिटीज के मुताबिक, देना बैंक से नकारात्मक असर पड़नेवाला है। बैंक ऑफ बड़ौदा के सीईओ पीएस जयकुमार का मानना है कि विलय से उनका बैंक और मजबूत होगा क्योंकि इससे पश्चिम और दक्षिणी इलाके में उसकी पहुंच बढ़ेगी। उनके मुताबिक, नए बैंक को बड़े CASA (करंट अकाउंट सेविंग्स अकाउंट) रेशियो और विभिन्न क्षेत्रों में दिए लोन का भी फायदा होगा।


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