• संवाददाता

केरल में बांध होते या ना होते, बाढ़ का आना तय था: रिपोर्ट


कोच्चि केरल में बाढ़ ने बीते महीने भयंकर तबाही मचाई थी। माना जा रहा था कि इस भीषण बाढ़ के पीछे बांधों का बड़ा रोल था और इन्हीं से पानी छोड़े जाने की वजह से बाढ़ आई। मगर सेंट्रल वॉटर कमिशन की रिपोर्ट ने अब इस शंका से पर्दा हटा दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक, बांधों से बाढ़ के स्तर पर कोई असर नहीं पड़ा। बाढ़ आने की मुख्य वजह थी जून-जुलाई 2018 में हुई सामान्य से कहीं ज्यादा बारिश। रिपोर्ट के मुताबिक, जून-जुलाई में ज्यादा बारिश की वजह से 14 अगस्त तक ज्यादातर बांध फुल रिजरवॉयर लेवल (एफआरएल) पर आ गए थे। अगर ये बांध एफआरएल से थोड़े नीचे भी होते तो बाढ़ के स्तर पर कोई असर नहीं पड़ता क्योंकि तीन-चार दिन तक भयंकर तूफान और बारिश से ये भर ही जाते और किसी भी हालत में इनसे पानी छोड़ना पड़ता।

केरल डैम सेफ्टी अथॉरिटी के चेयरमैन जस्टिस सीएन रामचंद्रन ने कहा, 'हमारे बांध गर्मी में पैदा होने वाली जरूरतों को पूरा करने के लिए हैं। हम मॉनसून का अंदाजा लगाकर डैम को पहले से खाली नहीं कर सकते।' उन्होंने सेंट्रल वॉटर कमिशन की रिपोर्ट का स्वागत किया।

बता दें कि केरल में 57 बड़े बांध हैं। इनमें से चार को तमिलनाडु द्वारा संचालित किया जाता है। इनकी कुल स्टोरेज क्षमता करीब 5.806 अरब क्यूबिक मीटर है। यह केरल में बहने वाली 44 नदियों के सालाना औसत रनऑफ का 7.4 फीसदी है, जो असल में करीब 78 अरब क्यूबिक मीटर है।

बता दें कि 1 से 20 अगस्त के बीच इस साल राज्य में 771 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई थी। 1931 के बाद से अगस्त में इतनी बारिश पहले कभी नहीं हुई थी। आईएमडी के क्लाइमेट डेटा मैनेजमेंट ऐंड सर्विसेज के प्रमुख पुलक गुहाठाकुरता का कहना है कि 1931 में केरल में अगस्त महीने में 1,132 मिलीमीटर बारिश रिकॉर्ड हुई थी। यह सबसे ज्यादा बारिश वाला महीना था।


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