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2019 चुनाव से पहले FRDI बिल को ठंडे बस्ते में डालेगी मोदी सरकार


नई दिल्ली 2019 लोकसभा चुनाव से पहले किसी विवाद से बचने और आशंकित निवेशकों को शांत करने के लिए मोदी सरकार फाइनैंशल रेजॉलूशन ऐंड डिपॉजिट इंश्योरेंस (FRDI) बिल, 2017 को ठंडे बस्ते में डाल सकती है और इसे संसद के मौजूदा सत्र में पेश नहीं करेगी। इसे 11 अगस्त 2017 को लोकसभा में पेश किया गया था। प्रस्तावित बिल के एक प्रावधान की वजह से डिपॉजिटर्स के बीच दुविधा और आशंकाओं का माहौल बन गया। बैंकों को दिवालिया होने से बचाने के लिए, ड्राफ्ट बिल में 'लायबिलिटीज को राइट डाउन' करने का प्रस्ताव है, जिसकी व्याख्या कुछ लोगों ने बेल-इन के रूप में की। इससे अधिकतर लोगों को लगा कि बैंकों में जमा उनका धन खतरे में पड़ सकता है। कई राज्यों में लोगों ने एटीएम से नकदी निकासी भी शुरू कर दी जिससे कैश किल्लत होने लगी। हालांकि, जिस प्रावधान को लेकर विवाद हुआ वह पहले से मौजूद है। अभी बैंक डिपॉजिटर्स को 1 लाख रुपये तक की रकम पर ही डिपॉजिट इंश्योरेंस ऐंड क्रेडिट गारंटी कॉरपोरेशन (DICGC) की गारंटी मिलती है। बैंक खाते में जमा 1 लाख रुपये से ऊपर जितनी रकम बचती है, उसके लिए डिपॉजिटर्स का क्लेम अनसिक्योर्ड क्रेडिटर्स के बराबर माना जाता है। इन आशंकाओं के बीच अथॉरिटीज ने बैंकों में जमा राशि के लिए सिक्यॉरिटी कवर बढ़ाने पर भी विचार किया था। सरकार ने जमाकर्ताओं को कई बार आश्वासन दिया कि वह उनके और वित्तीय संस्थाओं के हितों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। इसके साथ ही विपक्षी दलों पर अनावश्यक विवाद उत्पन्न करने का आरोप लगाया। सरकार ने कहा कि 70 फीसदी जमा पब्लिक सेक्टर बैंकों में है और शेष मजबूत पूंजी वाले प्राइवेट बैंकों में, इसलिए जमाकर्ताओं के पैसे डूबने की कोई संभावना नहीं है। एक सूत्र ने कहा, 'चुनावी साल में सरकार ऐसा कुछ नहीं करना चाहती है जो जनविरोधी लगे।'


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