• डॉ.दीपकुमार शुक्ल

पुस्तक : तुम समझे न हम समझे


कविता आत्माभिव्यक्ति का एक उत्कृष्ट माध्यम है। किन्तु जब वही कविता पढ़ने वाले को आत्मबोध, कर्मबोध, धर्मबोध, समाजबोध, संस्कारबोध, संस्कृतिबोध, युगबोध, जगबोध, प्रकृतिबोध और ईशबोध कराने में समर्थ हो तब उसे सार्थक या संदेशपरक कविता कहा जाता है। ऐसी कविता को सुनकर या पढ़कर अनायास ही मुंह से ‘वाह’ निकल जाता है। कवि ‘अजीब’ आदित्य कुमार कटियार का प्रथम कविता-संग्रह ‘तुम समझे न हम समझे’ में संग्रहित कवितायेँ उपरोक्त दृष्टि से सार्थक कही जा सकती हैं। कवि ने अपने जीवन के अनुभवों को आत्मसात करते हुए उसे शब्द दिए हैं। अब इसमें अजीब क्या है? यह तो सभी कवि करते हैं। अनुभवों को आत्मसात किये बिना कविता का सृजन हो भी नही सकता। यहाँ कहने का आशय यह है कि प्रत्येक कवि का प्रथम काव्य-संग्रह उसके अनुभवों के अत्याधिक निकट होता है। कवि अपने जीवन के प्रत्येक अनुभव को अपने प्रथम संग्रह में उड़ेलकर खाली हो चुका होता है। इसके आगे की कविताओं में जो अनुभव वह प्रस्तुत करता है, उनकी समयावधि बहुत कम होती है। जबकि प्रथम संग्रह की कविताओं में उसके पास एक-एक विषय के अनेक अनुभव और उन पर बहुत ही लम्बा चिन्तन होता है। अगले संग्रह के लिए या तो वह अपने पहले संग्रह से अनुभूतियों की चोरी करता है या फिर दूसरों की अनुभूतियों को अपने शब्द देने की कोशिश करता है। हाँ इतना अवश्य है कि शब्द गढ़ने में तब तक वह माहिर हो चुका होता है। प्रथम संग्रह में अनुभूतियाँ होंगी, चिन्तन होगा, मन्थन होगा परन्तु साहित्यिक शब्दों का टोटा रहेगा। मात्रिक दोष तो होगा ही। अगर कवि साहित्यिक पृष्ठभूमि वाला नहीं है तो इसकी सम्भावना और भी अधिक बढ़ जाती है। जबकि दूसरे संग्रह में इन कमियों में क्रमशः कमी आती है। कवि आदित्य कुमार कटियार का काव्य-संग्रह अनुभव और चिन्तन की दृष्टि से एक उत्कृष्टि कृति की श्रेणी में आता है। जो अनेक स्थानों पर पाठक के मन को स्पर्श करता है। सरस्वती-वन्दना के बाद प्रथम कविता (शीर्षक कविता) ‘तुम समझे न हम समझे’ बहुरंगी दुनियां में व्याप्त सामाजिक बिडम्बनाओं और अन्धविश्वास पर गहरी चोट करती है। इस कविता की ये पंक्तियाँ ‘खोजा हमने गली-गली और जाकर द्वारे-द्वारे भी। खेले कोई सोना चाँदी कोई न पाए निवाला भी। दुनियां की है रीति यही क्या? तुम समझे न हम समझे।’ अमीरी-गरीबी के बीच के अन्तर को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करती हैं। संगठित परिवार ही संगठित समाज का निर्माण कर सकते हैं। परन्तु भौतिकता की अन्धी दौड़ में भाग रहे समाज में परिवार नामक संस्था धीरे-धीरे विघटित हो रही है। कवि अजीब इस सच्चाई को कुछ इस तरह व्यक्त करते हैं ‘आज की दृष्टि में निखर चुका है। हर कोई शिखर पर पहुँच चुका है। ख्वाहिशों के लिए दूर और दूर तक निकल चुका है। कई बार बहक चुका है। हर तरह से टूटकर टुकड़े-टुकड़े को चुका है। अपनी जगह से पूरी तरह उखड़ चुका है। ये कह सकते हैं लगभग उजड़ चुका है। आज हर परिवार’। भ्रष्टाचार का दीमक भारत को अन्दर ही अन्दर खोखला करता जा रहा है। कवि अजीब ने इस समस्या को कुछ इस तरह से व्यक्त किया है ‘हर तरफ एक ही शोर है, बचा नहीं एक भी कोर है। इंसानियत का पता नहीं, भ्रष्टाचार का ही जोर है। हम भी कोई अलग नहीं, सुविधायें चाहते विशेष हैं। जुगाड़ है सभी का ‘अजीब’ इसलिए भ्रष्टता चहुँओर है।’ देश-दुनियां में गरीबी का मुद्दा बहुत पुराना है और यह आगे भी रहेगा। ऐसा क्यों है, इसका कारण आदित्य कुमार ने ‘मुद्दा’ शीर्षकधारी कविता में बताया है ‘मुद्दा इस देश का था गरीबी, सता रही चिन्ता बार-बार ये सोचकर, गर हो गयी खत्म गरीबी तो गरीब होगा ही नहीं, न होगा मेरे पास वोट खातिर कोई ‘अजीब’ मुद्दा’। प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में अनेक बार समय और परिस्थितियों के साथ सामंजस्य बिठाना पड़ता है। अजीब ने अपने जीवन के ऐसे अनेक अनुभवों को लेकर कविता रच दी ‘बेरुखे मन से न जाने क्यों करना पड़ता है? ढलना पड़ता है, उसी माहौल में, जैसे पानी ढलता बर्तन के आकार में, निभाना पड़ता वो रस्म, वही परम्परा बार-बार पीने पड़ते आंसुओं के कडुवे घूँट, दबाने पड़ते अपने ही अरमान, छटपटाते हुए एक पक्षी की तरह, बेवजह स्वीकार करते अनजान बनकर, उसी मुस्कराहट के साथ, बिठाना पड़ता सबके समक्ष हमेशा ‘अजीब’ वही सामंजस्य’। कृति की ऐसी अनेक रचनाएँ कवि के जीवन की खट्टी-मीठी अनुभूतियों से प्रस्फुटित हैं। कुछ रचनाएँ श्रृंगार रस से भी ओत-प्रोत हैं। नायक-नायिका की प्रणय-लीला में संयोग-वियोग की मार्मिक अनुभूतियाँ ह्रदयस्पर्शी हैं। वियोग की स्थिति में उलाहनों और आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलता ही है। कटियार जी ने इस स्थिति को कुछ इस तरह प्रस्तुत किया है ‘तुमने ही कहा था, निभाउंगी दोस्ती, धूप छाँव की तरह ताउम्र, बिना किसी अवरोध के। तुम ही कह रही हो, कैसे होगा, भूल जाओ, नहीं हो सकता ये और मुझसे, नहीं निभा सकूंगी अब, है ये कैसा तुम्हारा निर्णय ‘अजीब’ दोस्ती का।’ भाग्य और कर्म की चर्चा आदि काल से होती आ रही है। कई बार लोग भाग्य के भरोसे रहकर कर्म की चेष्टा ही बन्द कर देते हैं। कवि ऐसे लोगों पर तंज कसते हुए कहता है ‘चन्द लकीरें ही हैं जिन्दगी, तेरी ही हथेली पर, लिखा है भाग्य, जो पायेगा तू अपने वक्त पर, चाहता है जिन्दगी बिताना, उसी भाग्य के भरोसे हाथ पर हाथ रखकर, क्यों करूँ? जब है मेरे भाग्य में ही सब, बैठा हूँ इसीलिए, कर्तव्य से विमुख होकर, कर रहा हूँ आज भी ‘अजीब’ उस पल का इन्तजार’ लेकिन इसके आगे विधि के विधान को भी कवि अटल मनता है ‘ज्ञान है, है यहाँ विज्ञान भी, गर्व में ये भूल मत, है यहीं विधि का विधान भी।’ ‘एक नहीं कई आशियाना’ नामक कविता के माध्यम से कवि परिन्दों से सीख लेने के लिए प्रेरित करता है ‘जब चाहता है और जहाँ चाहता है परिंदा, ढूढ़ लेता है ठिकाना, एकत्रित कर तिनके-तिनके, अपने मुताबिक, सुन्दर ढंग से, बिना किसी अड़चन के, बना लेता है आशियाना, करते नहीं एकत्र कुछ भी, मानव की तरह धन-दौलत, न ही कल के लिए खाना, इसी धरा पर मानव आज भी, जो हैं सर्वगुणसंपन्न, करते श्रम भी अथाह, झगड़ रहे इंच-इंच के लिए और लिये घूमते पैमाना’ । पति प्रताड़ित पत्नी और पत्नी पीड़ित पति से जब कोई यह कह देता है कि विवाह सात जन्मों का बन्धन है तो उनके अन्दर भूचाल आना स्वाभाविक है। मन ही मन गणना होने लगती है कि यह वाला जन्म पहला है या सातवां या फिर बीच का? लेकिन संतुष्टि रहती है कि चलो सात के बाद तो पिण्ड छूट ही जायेगा। अब यदि किसी ने यह कह दिया कि विवाह तो जन्म-जन्मान्तर का बन्धन है, तब तो भूचाल की गति कई गुना बढ़ जाती है। आदित्य जी के काव्य-संग्रह की अंतिम रचना ‘यहाँ पर शादी में सात फेरों का रिवाज है’ पाठकों को मुस्कराने पर विवश कर देती है। इसमें उन्होंने शादी के बंधन को सात जन्मों तक ही सीमित रखा है ‘यहाँ पर शादी में फेरों का रिवाज है, रात भर में कुल सात फेरे होते हैं। छः फेरों में दूल्हा चकरा जाता है, दिए हुए बचनों से घबरा जाता है। फेरों के दौरान दोनों के बीच एक, बहुत बड़ा गठबंधन होता है। गाँठ तो उसी दिन पड़ जाती है, जो सात जन्मों का बन्धन होता है। फेरों में जो गाँठ लगायी जाती है, खोलते-खोलते उम्र बीत जाती है। लगे रहो तुम मुन्ना भाई की तरह, यह सात जन्मों के लिए लगायी जाती है। फेरों में मत आना, शादीशुदा मर्द कुवाँरों को बार-बार समझता है। फेरे पड़ते ही अच्छा भला आदमी ‘अजीब’ बन्धन में बंध जाता है।’ कवि ‘अजीब’ आदित्य कुमार कटियार का यह कविता-संग्रह विचारशीलता से ओतप्रोत, जीवन की विभिन्न अनुभूतियों से आच्छादित एवं संदेशपरक है। कटियार जी गणित के विद्यार्थी रहे हैं। इसलिए उनकी रचनाओं में साहित्यिक शब्दावली की कमी होना स्वाभाविक है। प्रायः सामान्य शब्दों में ही कवि ने अपने भाव प्रगट किये हैं। हर शब्द स्वयं में अर्थ है। जिसे काव्य की तीन विधाओं अभिधा, लक्षणा और व्यंजना में अभिधा की संज्ञा दी जाएगी। कवि अजीब को इस कृति के लिए कोटिशः बधाई एवं शुभकामनायें।

(कविता संग्रह) रचनाकार: अजीब’ आदित्य कुमार कटियार प्रकाशक: निखिल पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स, आगरा


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