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'विदेशी' आर्थिक सलाहकारों ने छोड़ा साथ, अब स्वदेशी के अजेंडे पर मोदी सरकार ?


नई दिल्ली पीएम नरेंद्र मोदी ने 2014 में जब देश की सत्ता संभाली थी तो उन्होंने आर्थिक नीतियों को लागू करने के लिए अमेरिका में काम करने वाले अकादमिक जगत के तीन विद्वानों पर भरोसा जताया था। इन तीनों ने ही अमेरिका में उदार और वैश्विक इकॉनमी के अजेंडे पर काम किया था। अब पूरे 4 साल बीत चुके हैं और नरेंद्र मोदी के सामने अगले आम चुनाव की चुनौती है। लेकिन, इन 4 सालों में पीएम मोदी के आर्थिक अजेंडे में बदलाव आता दिख रहा है। कम से कम एक दर्जन सरकारी अधिकारियों, नीति निर्देशकों और बीजेपी के ही कई नेताओं का कहना है कि सरकार की पॉलिसी मेकिंग का जिम्मा काफी हद तक पीएमओ के ही पास है। इसके अलावा दक्षिणपंथी और राष्ट्रवादी अर्थशास्त्रियों की एक मंडली भी नीतियों को तय करने के काम में जुटी है। अधिकारियों का कहना है कि इन तीनों ही अर्थशास्त्रियों का जाना बताता है कि सरकार अब फ्री ट्रेड और ओपन मार्केट की बजाय घरेलू उद्योग और किसानों के हितों के संरक्षण को तवज्जो दे रही है। अधिकारियों का कहना है कि पीएम मोदी का आर्थिक दृष्टिकोण फिलहाल यह है कि घरेलू उद्योगों को मजबूती दी जाए। यह ठीक अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के अजेंडे की तरह है, जो इन दिनों घरेलू इंडस्ट्री पर ध्यान दे रहे हैं और उसके मद्देनजर इंपोर्ट टैरिफ बढ़ा रहे हैं और विदेशी कंपनियों पर कई तरह के नियम लगा रहे हैं। इस पूरे मसले पर वित्त मंत्रालय के प्रवक्ता ने कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। यही नहीं पीएमओ ने भी इससे जुड़े सवालों के जवाब नहीं दिए। 2014 में सत्ता संभालने के बाद आरबीआई के गवर्नर के तौर पर पीएम मोदी ने रघुराम राजन को बनाए रखा था, जो 2016 में रिटायर हुए और फिर शिकागो यूनिवर्सिटी चले गए, जहां कि वह प्रफेसर हैं। इसके अलावा नीति आयोग के चेयरमैन रहे अरविंद पनगढ़िया ने 2017 में थिंक टैंक को छोड़ दिया और वापस कोलंबिया यूनिवर्सिटी में पढ़ाने के लिए चले गए। इसके बाद पिछले ही दिनों देश के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन ने अपने परिवार के साथ समय बिताने, रिसर्च करने और लेखन के नाम पर सरकार से इस्तीफा दे दिया। वह पहले इंटरनैशनल मॉनिटरी फंड में काम कर चुके थे।


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