• लेखक डॉ सरला सिंह

बारिश


बारिश का मौसम ये, सुहाना सुहाना सा लगे । धरा की धानी साड़ी , सभी के जिया को हरे । बगीचों की शोभा ये, सभी से अलग है लगे । नदियों का कलरव ये, नवगीत गाती सी लगे । आकाश की चाँदनी ये, चम्पा के फूलों-सी लगे। तालाबों की शोभा कैसी थाल के पानी -सी सजे । बगियों के आम जामुन, ललचाते सब को-ही दिखें। धान की फसल सजी हुई, धानी साड़ी धरा की है लगे। बारिश की बूँदें अमृतमयी, बरसाती नवजीवन सी दिखें।

डॉ.सरला सिंह

दिल्ली


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