• लेखक पंकज कुमार मिश्रा

एक कप चाय


एक कप चाय से कई ताने -बाने , बहुत से मनपंसद बहुत कुछ अन्जाने ,, जुड़ी हुई उंगलियॉ और कुछ शिकन एक कप चाय पर परेशान होता दिन फिर आ ठहरता उसी एक कप चाय पर । जिंदगी की वाहियात अदाकारी से परेशान थका मादा इंसान सोचता भी तो , फिर आ ठहरता उसी एक कप चाय पर ।। गर्मियों की थकान गुनगुने ठंड की मुस्कान बारिशो में भिंगते बालो के किनारों से टपकता अनसुना बौछार हर जगह बस एक जरूरत अपनो के आसपास आ ठहरता उसी एक कप चाय पर । कही चुनिंदा वादों को याद दिलाती शामें कई घंटो बैठ समझाती अपनी इत्मिनानें जब ऊब जाती तो फिर आ ठहरती उसी एक कप चाय पर ।। और फिर मॉ की आवाज जगा जाती , सुबह के सात बज गये कहॉ ठहरती है ये जिंदगी उंगलियों के बीच फंसी, एक कप चाय पर । परेशान होता दिन और फिर आ ठहरता उसी एक कप चाय पर ।। ************""""***** @ पंकज कुमार मिश्रा जौनपुरी


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