• लेखक सीताराम गुप्ता,दिल्ली

बड़ा या महत्त्वपूर्ण कार्य करने वाले को मनमानी करने की छूट नहीं मिलती अपितु उनकी जिम्मेदारियां बढ़ जात


जब हम अपने जीवन में कोई बहुत अच्छा या महत्त्वपूर्ण कार्य करते हैं तो उसकी प्रशंसा होना या पुरस्कार मिलना स्वाभाविक है। प्रशंसा भी होनी चाहिए और पुरस्कार भी मिलना चाहिए। इससे व्यक्ति को और अधिक अच्छा करने की प्रेरण मिलती है। कुछ लोग सोचते हैं कि समाज में एक बार प्रतिष्ठा मिल जाने पर उन्हें मनमानी करने का लाइसेंस मिल गया है। आजकल राजनीति और आध्यात्मिक जगत में ऐसा ही हो रहा है। जिसे देखो वही मनमानी कर रहा है। कोई भ्रष्टाचार में लिप्त है तो कोई व्यभिचार में लिप्त है। जनप्रतिनिधि जनता का भरोसा तोड़ रहे हैं तो तथाकथित महाराज भक्तों का। वास्तव में कुछ अच्छा या महत्त्वपूर्ण कार्य करने वाले को उसके पुरस्कारस्वरूप मनमानी करने की छूट नहीं मिलती।

जब हमें कोई महत्त्वपूर्ण पद या ज़िम्मेदारी का काम मिल जाता है तो भी हमें किसी भी तरह से नियम तोड़ने की छूट नहीं मिलती। हमारी अच्छाई या महत्त्व तभी तक बरकरार रहता है जब तक हम एक अच्छे नागरिक की तरह नियमों का पालन करते हैं और हमारा आचरण पवित्र बना रहता है। यदि ऐसा नहीं होता है तो हम पतन की ओर उन्मुख होने लगते हैं। साथ ही हमारी अच्छाइयां निष्प्रभावी होने लगती हैं और उनका सकारात्मक प्रभाव भी समाज पर नहीं पड़ता। हमारे आचरण में गिरावट या नैतिक पतन के साथ न केवल हमारी अच्छाइयों का अंत हो जाता है अपितु हम समाज व कानून की दृष्टि में दोषी भी हो जाते हैं और उसका एकमात्र उपचार है दण्ड।

मुझे एक दशक पुरानी बात याद आ रही है। मैं पूना में तिलक जी के प्रपौत्र डाॅ0 दीपक तिलक से मिलने गया था। जब मैंने उनसे पूछा कि तिलक जी की परंपरा से जुड़ने पर आपको कैसा लगता है तो वे चुप ही रहे। जब मैंने कहा कि ज़ाहिर है कि अच्छा ही लगता होगा तो उन्होंने संक्षिप्त सा उत्तर दिया और वो उत्तर है, ‘‘हमारी जिम्मेदारी बढ़ जाती है।’’ जब भी हम किसी महान परंपरा या उद्देश्य से जुड़ते हैं तो हमसे लोगों की अपेक्षाएं बढ़ जाती हैं और उसी अनुपात में हमारी जिम्मेदारियां भी बढ़ जाती हैं। हमारे ऊपर स्वयं के आचरण के माध्यम से समाज में ईमानदारी, तटस्थता, सहिष्णुता, नियमपालन आदि उदात्त जीवन मूल्यों को स्थापित करने का दायित्व आ जाता है।

जो लोग उत्तरदायित्व के नियम को समझते हैं और तदनुरूप आचरण करते हैं वे सचमुच महान हैं और ऐसे लोग ही वास्तव में समाज व राष्ट्र के लिए कुछ अच्छा कर पाते हैं। कुछ लोग निस्संदेह समाज के लिए बहुत अच्छे कार्य करते हैं लेकिन उसी अनुपात में उनमें अहंकार व अनैतिकता भी आ जाती है। वे अवगुणों की खान बन जाते हैं। निरंतर अहंकार व अनैतिकता अथवा दूसरे अवगुणों के कारण कार्य के परिणाम भी प्रभावित होते हैं जिससे अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाते। यदि हम केवल और केवल प्रशंसा की कामना से कोई अच्छा कार्य करते हैं तो भी वो पूर्ण तरह से उपयोगी सिद्ध नहीं होता। हम मन से महामना बनने का प्रयास करें तभी महानता का उदय होता है और उपयोगी सृजन भी।

हम कितने भी अच्छे कार्य करने वाले क्यों न हों दूसरों के प्रति हमारा व्यवहार भी अच्छा होना चाहिए। यदि हम ख़ूब काम करते हैं और समाज के लिए भी उपयोगी काम करते हैं तो इसका ये तात्पर्य कदापि नहीं कि हम दूसरों से बेरुख़ी से पेश आएं अथवा जो मर्ज़ी उन्हें कह दें। इसके लिए हम दूसरों के लिए प्रेरणास्रोत व सबके लिए सम्मान के पात्र तो हो सकते हैं पर विशेष रूप से सम्मान के पात्र नहीं। हमारे सम्माननीय होने का ये अर्थ नहीं है कि अन्य सभी प्रताड़ना अथवा उपेक्षा के पात्र हो गए। हमें हर हाल में दूसरों के सम्मान व प्रतिष्ठा का ध्यान रखना चाहिए।

यदि हम हमेशा घ्यानपूर्वक कार्य करते हैं लेकिन कभी-कभार कोई ग़लती हो जाती है तो इसका भी ये अर्थ नहीं कि हमारे अच्छे रिकाॅर्ड के लिए उस ग़लती को नज़रंदाज़ कर दिया जाए। हमें स्वयं उस ग़लती को स्वीकार करके उसका परिमार्जन करना चाहिए। हमारे व्यवहार और कार्यशैली में अनेकानेक छोटी-बड़ी कमियां हो सकती हैं। उनके प्रति सचेत रहकर उन्हें हर हाल में दूर करना ही जीवन का वास्तविक विकास है। बड़े लोग बड़े काम करके जताते नहीं। जो लोग आत्मप्रशंसा में मुग्ध होकर स्वयं की महानता के कसीदे पढ़ते रहते हैं और दूसरों को कोसते रहते हैं चाहे वे कितना भी नाटक करें उनकी महानता में ही नहीं उन्होंने कुछ विशेष किया होगा इस पर भी संदेह होना चाहिए।

सब चाहते हैं कि हमारे अच्छे कामों के लिए हमारी प्रशंसा की जाए। हमें भी दूसरों के अच्छे कामों के लिए उनकी प्रशंसा ही नहीं करनी चाहिए उन्हें लगातार प्रोत्साहित भी करते रहना चाहिए। यदि कोई हमारे लिए कुछ करता है तो धन्यवाद ज्ञापन के साथ-साथ कृतज्ञता का भाव भी हममें होना चाहिए। सद्गुणों व अच्छी आदतों का विकास होने से व्यक्ति व्यक्तित्व भी अधिकाधिक आकर्षक हो उठता है और घर-परिवार के साथ-साथ कार्य स्थल पर भी उसके प्रति स्वीकृति बढ़ जाने से वह तनावमुक्त होकर अपना कार्य और अच्छी तरह से कर सकता है। हमारे अच्छे स्वास्थ्य के लिए भी यह ज़रूरी है।


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