• डॉ.दीपकुमार शुक्ल

सुमंत्र: एक प्रेरणाप्रद काव्यकृति


काव्य-सृजन के पथ पर उत्तरोत्तर गतिमान डॉ.अशोक कुमार गुप्त की काव्यकृति ‘सुमंत्र’ सांस्कृतिक, सामाजिक एवं राजनीतिक चेतना का संचार करते हुए कर्तव्य बोध कराने वाली उत्कृष्ट कृति है। किसी व्यक्ति विशेष के नाम पर सृजित खण्डकाव्य के माध्यम से वस्तुतः कवि उस व्यक्ति के जीवन दर्शन से आम जन को परिचित कराना चाहता है। साथ ही अपने काव्यगत उद्देश्य ‘काव्यंयशसे अर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये सद्यःपर्निर्वृतये कान्तःसम्मितयोपदेशयुजे’ से भी जुड़ा रहना चाहता है। कवि अशोक जी इस रचना के सृजन में उक्त दोनों ही उदेश्यों के बीच अन्त तक सन्तुलन बनाये रखने में पूर्णतया सफल दिखाई देते हैं। एक ओर जहाँ वे श्रीराम वनगमन के समय सुमंत्र जी की अन्तर्दशा को प्रस्तुत करते हुए उनके व्यक्तित्व और स्वभावगत गुणों का प्रभावी ढंग से परिचय कराते हैं, उनकी स्वामिभक्ति तथा राज्य के प्रति निष्ठा का बोध कराते हैं - यथा ‘चंचल मन मुझको सन्मति दो, जनहित के ही सब करूँ कर्म, नृप की आज्ञा का पालन हो, निर्वाह कर सकूँ पुण्य धर्म। तज कपट भाव सेवा करना, सच्चे सेवक का परम धर्म, कर्तव्य और सद्निष्ठा से, सीखूँ जीवन का सहज मर्म। आदेश न माने स्वामी का, कैसे सेवक कहलायेगा, अपने मन की करते-करते स्वच्छंद स्वयं हो जायेगा।’ वहीँ दूसरी ओर प्रजाजनों के मनोभावों के प्रति सुमंत्र जी की संवेदनशीलता का भी दर्शन होता है - ‘किस मुंह से कहूँ अयोध्या से, मैं लिये राम को जाता वन, कैसे कह दूँ सब रखो धर्य, रख पाऊं कैसे सबका मन।’ इसके अगले सोपान में ‘मूर्तिवत खड़े चिन्तित सुमंत्र, किस भाँति अयोध्या को जाऊँ, दुःख मग्न अयोध्या के वासी किस भांति उन्हें मैं समझाऊं।’ श्रीराम को उपेश देते सुमंत्र जी के माध्यम से डॉ.अशोक सामाजिक, राजीनीतिक और सांस्कृतिक चेतना का भी बड़े प्रभावी ढंग से संचार करते हैं - ‘प्रत्येक चमकती हुई वस्तु, क्या कंचन होती है जग में, है रंग रक्त का लाल मगर, बहता अन्तर से हर रग में। यह पावनता के साथ-साथ, मानवता हित में रहे देह, हिल-मिलकर हम सब काम करें, सुन्दर मन्दिर यह बने गेह। यदि सत्य अहिंसा का पालन, इस जग में सब को आ जाए, तो आत्मशक्ति का ब्रह्म अस्त्र बिन अर्थ खर्च के पा जाए। सौ झूँठ बोलकर भी मानव, कब उज्ज्वल सत्य छिपा पाता, है सत्य सूर्य सा दीप्तिमान, जोड़ता ईश से भी नाता। जो जागृत है वह पा लेता, निर्दिष्ट लक्ष्य अपना जग में, जो शूलों पर चल लेता है, बिछते हैं पुष्प उसी मग में।’ काव्यकृति के प्रथम सोपान का प्रारम्भ सरस्वती वन्दना से होता है। कवि अशोक ने अपने प्राक्कथन ‘मन कहता है’ में श्रीरामचरितमानस को काव्यकृति का सम्बल स्वीकार किया है। अतः श्री गोस्वामी जी का गुणानुकरण होना स्वाभाविक है। सरस्वती-वन्दना के साथ-साथ अशोक जी तुलसीदास जी की ही तरह गणेश, गौरी, गुरु, गीता, गौ, गंगा तथा बजरंगबली का भी ध्यान करते हैं। माता कौशिल्या तथा दशरथ जी की वन्दना करते हुए भगवान राम एवं माता सीता का भी स्तवन करते हैं। अन्त में अपने माता-पिता को प्रणाम करके द्वतीय सोपान में अयोध्या की तत्कालीन भौगोलिक, सामाजिक एवं राजनीतिक स्थिति का वर्णन करते हुए उसके अध्यात्मिक महत्व का भी दर्शन कराते हैं - ‘जिस अवधभूमि की महिमा का, नर देव दनुज गुण गान करें, उसकी रजकणिका अतुलनीय, उसका ऋषि-मुनि सम्मान करें। यह अवधभूमि इतनी पावन, कण-कण में रमते राम-राम, साकेत अयोध्या अवधपुरी, इसके मन भावन कई नाम।’ अयोध्या में अनेक महान और आदर्शवादी राजा हुए हैं। अशोक जी उनका उल्लेख करते हुए उनकी महानता को अपने शब्दों में प्रस्तुत करते हैं - ‘अनगिनत हुए नृप धीर-वीर, ज्ञानी-ध्यानी औ विज्ञानी, जिनकी हर अनुपम गाथा का, है नहीं कहीं जग में सानी। भूखा याचक खाली न गया, इस दान मही की सीमा से, उन्मुक्त ह्रदय से दान किया, निज कुल गौरव कुल गरिमा से। नृप हरिश्चन्द्र, रघु, अज दिलीप, संस्कृति की स्वयं धरोहर हैं, निज बचन बद्धता के पालक, नृप दशरथ स्वयं सहोदर हैं।’ यहाँ सहोदर शब्द थोड़ा भ्रमित करता है। क्योंकि कुछ शब्द ऐसे होते हैं जिनका एक निश्चित अर्थ होता है। ऐसे शब्द किसी अन्य शब्द के विकल्प कभी नहीं बन पाते हैं। सहोदर शब्द भी उन्हीं में से एक है। तृतीय सोपान ’राज्याभिषेक‘ में राजा दशरथ स्वयं को वृद्ध मानकर श्रीराम को सिंहासन पर बैठाने की घोषणा कर देते हैं - ‘आ गया अचानक एक दिवस, भूपति दशरथ के मुकुर हाथ, अवलोका केश गहनता से, हो चुके श्वेत से निकट माथ।’ ‘रायं सुभायँ मुकुर कर लीन्हा। बदनु बिलोक मुकुट सम कीन्हा।। श्रवन समीप भए सित केसा। मनहुं जरठपन अस उपदेसा।।’, ‘गुरु के चरणों में झुका शीश, बोले अभिवादन लो मेरा, गुरुवार अर्पित है राज-पाट, सिंहासन पर हो राम मेरा।’ उसके बाद दासी मंथरा द्वारा महारानी कैकेयी को समझाना, कैकेयी का कोप भवन में जाना, राजा दशरथ का उन्हें मनाने का प्रयास करना, कैकेयी द्वारा पूर्व में घोषित दो वरदान मांगना। इन सभी तथ्यों को कवि ने बड़े ही प्रभावी ढंग से अपने शब्दों में प्रस्तुत किया है। अगला सोपान ‘सुमंत्र आगमन’ है। यहीं से काव्यकृति अपने शीर्षक से पूरी तरह जुड़ती है। राजा दशरथ ने सुमंत्र को यह आदेश दिया था कि कैसे भी हो श्रीराम, लक्ष्मण और सीता को वन से घुमाकर वापस ले आना। ‘जब किसी युक्ति से नहीं हुआ, अवरुद्ध राम का वन जाना, नृप ने सुमंत्र से वचन कहे, दिखलाकर वन वापस लाना।’ एक ओर राजा का आग्रहयुक्त आदेश तो दूसरी ओर श्रीराम की वचन बद्धता। सुमंत्र जी के इस अन्तर्द्वंद को कवि की लेखनी कुछ इस तरह से व्यक्त करती है - ‘मन मेरा कितना आकुल है, कैसे इसको समझाऊं मैं, दिख रहा कूप, पीछे खाईं, अब कैसे प्राण बचाऊं मैं।’ उसके बाद सुमंत्र जी के अन्तःपटल पर बीते हुए समय के अनेक दृश्य उभरने लगते हैं। श्रीराम एवं लक्ष्मण को यज्ञ रक्षार्थ लेने के लिए विश्वामित्र जी का आगमन तथा चारो भाइयों के विवाह से लेकर अब तक का पूरा घटनाक्रम उन्हें एक-एक करके याद आता है। जिसे कवि ने बड़े ही प्रवाहपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया है। छठे सोपान ‘सुमंत्र की अन्तर्दशा’ में कवि संवेदना की अनन्त गहराइयों में उतरने में सफल होता है। श्रीराम के बिना अयोध्या लौटे सुमंत्र की अन्तर्दशा शब्दों की सीमा से परे है। फिर भी कवि अशोक ने उसे शब्दों में समेटने का प्रयास किया है - ‘दिग्भ्रमित पथिक सा उलझा मैं, आश्चर्य चकित दोराहे पर, सम्मुख है खड़ा धर्म संकट, अवरोध बीच चैराहे पर। हर सकूँ प्रजा की पीड़ा को, हे प्रभु मुझको सम्बल देना, नृप शोक-सिन्धु से उबर सकें, ऐसा उनको तप बल देना।’ सातवें सोपान ‘सुमंत्र का अवध आगमन’ में श्रीराम को वन में छोड़कर वापस लौटे सुमंत्र जी का राजा दशरथ से सामना होता है। पुत्र वियोग से आहत राजा की मनोदशा को देखकर सुमंत्र के मन में अपराध बोध होने लगता है और वे सहसा कह उठते हैं - ‘आ गया लौटकर मैं वन से, हे नृप! प्रणाम स्वीकार करो, लौटे न साथ सिय राम लखन, जो चाहे वह व्यवहार करो। हैं आप बहुत ही सहनशील, सब संकट संयम से सह लो, जो भी कहना हो बुरा-भला, जी भरकर आज मुझे कह दो।’ इसके बाद राजा दशरथ की असह्य वेदना और पटरानी कौशिल्या द्वारा उन्हें सम्हालने का प्रयास। कवि की लेखनी सम्पूर्ण दृश्य का चित्रण करने में पूर्णतया सफल दिखाई देती है। इसी कड़ी में राजा को श्रवण कुमार के वध और उसके माता-पिता द्वारा दिए गए श्राप की याद आ जाती है। वे सम्पूर्ण घटनाक्रम को महारानी कौशिल्या के सामने व्यक्त करते हुए और भी अधिक व्याकुल हो जाते हैं। इस सन्दर्भ में श्रवणकुमार के पिता और राजा दशरथ के बीच हुए संवाद को अशोक जी ने जिस ढंग से प्रस्तुत किया है वह अति प्रशंसनीय है - ‘तुम क्यों आये जल घट लेकर, मम दृग उजियारा लाल कहाँ, क्या लगी चोट या डूब गया, वह सरिता झरना-ताल कहाँ। तुम दोनों पियो प्रथम जल को, फिर समाचार बतलाऊंगा, जो दोगे मुझको दंड आज, वह मैं सहर्ष ही पाऊंगा। बतलाओ शीघ्र हाल उसका, है प्यास किसे अब लगी हुई, मैं बोल रहा सुनिए भूपति, अर्धांगिनि बैठी ठगी हुई। क्या बतलाऊं तुम दोनों को, कुछ नहीं कहा जाता मुख से, मर्मान्तक पीड़ा से आहत, मेरा शरीर भारी दुःख से। अनजाने में मैं हत्यारा, सुतघाती तुम मुझको कह लो, तुम पुत्रहीन हो गए आज, अब असहनीय पीड़ा सह लो। घट से लेकर जल हाथों में, दे दिया शाप उस पल क्षण में, जिस भांति बिलखते हम दोनों, तुम भी बिलखो चैथेपन में।’ अंतिम सोपान ‘शुभाषा’ में अशोक जी श्रीराम के प्रति अपने समर्पण और भक्तिभाव को व्यक्त करते हुए अन्त में श्रीराम की स्तुति करके कृति का समापन करते हैं। इस प्रकार आठ सोपानों की इस काव्यकृति में सुमंत्र नाम का पात्र भले ही मात्र दो सोपानों में सिमटा हो परन्तु सु-मन्त्र सम्पूर्ण काव्यकृति में विद्यमान हैं। जो रचनाकार की रचनाधर्मिता की पूर्णतः का द्योतक तथा जनसामान्य के लिए प्रेरणाप्रद है। अन्त में मैं डॉ.अशोक कुमार गुप्त ‘अशोक’ को इस कृति के लिए बधाई देते हुए उनके सुदीर्घ एवं सृजनात्मक जीवन की मंगल कामना करता हूँ और आदरणीय विधु जी के नारे को आवाज देता हूँ। जय हिन्दी, जय देवनागरी।


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