• सौरभ चटर्जी

(1+3) का फॉर्मूला कितना कारगर ?


लखनऊ (सौरभ चटर्जी) सूबे के डीजीपी ओपी सिंह ने फरमान जारी किया पुलिस की भर्ती चुनौतियों से निपटने के लिए अतिरिक्त प्रभारी निरीक्षकों के फार्मूले के तहत काम करेगी लिहाजा अब सूबे के ४१४ थानों में चार इंस्पेक्टरों की तैनाती का फार्मूला लागू हो गया सवाल है इस तैनाती से कानून व्यवस्था और अपराध नियंत्रण पर कितना प्रभावी होगा यह भविष्य के गर्त में छुपा है कुछ रिटायर्ड ऑफिसर इसे बेहतर बताते हैं तो कुछ नुक्ताचीनी निकालकर संशय जाहिर कर रहे हैं। पुलिस महकमे में बदलाव का सिलसिला पुराना है पिछले दो दशक में पुलिसिया हार्ड शैली में कई बार व्यापक बदलाव हुए लेकिन कानून की लाचार व्यवस्था सदैव चुनावी मुद्दा बनी रही ३ फरवरी २००९ को सूबे के लखनऊ इलाहाबाद गोरखपुर बरेली आगरा कानपुर वाराणसी के सभी जोन समाप्त कर सभी जोनों में आईजी की तैनाती की गई थी इसके बाद पुलिस वोट व्यवस्था खत्म की गई। सवाल है क्या थानेदारों की ज्यादा संख्या देखते फैसला लिया गया। चर्चा है कि गाजियाबाद और नोएडा जैसे शहरों में कोई भी अधिकारी चैन से नहीं बैठ पाता वीआईपी परेड में भी आगे पीछे घूमते रहते हैं फिर अपराध पर कौन नियंत्रण करेगा अदालत भी विवेचना के लिए अलग से विवेचना अधिकारी रखने का निर्देश दे चुकी है ताकि अदालती प्रक्रिया में रुकावट ना आने पाए। इससे पूर्व जनपदों में आईएएस अधिकारी कि प्रभारी स्तर पर नियुक्ति के बाद विसंगतियां पैदा हुई थी जनपदों में कमिश्नर जिलाधिकारी और प्रभारी अधिकारी तीनों आईएएस रैंक के होने पर आपसी टकराव अच्छा वर्चस्व का संकट पैदा हो गया था पूरे देश में पुलिसकर्मियों के जितने पद रिक्त हैं उनमें आधे पद अकेले आज भी एक दशक से यूपी में रिक्त पड़े हैं। होमगार्ड सिपाही की कमी के कारण बीट कांस्टेबल की प्रक्रिया बंद करनी पड़ी अब ४० फ़ीसदी पुलिसकर्मी भी वीआईपी सेवा में रहते हैं तो शहरी और ग्रामीण मैं क्राइम कंट्रोल कौन करेगा सूबे में जनता से संवाद और घटनास्थल पर पहुंचने का काम तो पुलिस विंग व्यवस्था पर आधारित होता है। पिछले तीन सरकारों में सूबे में पुलिस कर्मियों का टोटा रहा क्या किसी थाने में पुलिस कर्मियों का रिक्त स्थान भरा हुआ है अब माननीयों की हिफाजत में एक दर्जन पुलिसकर्मी लिप्त है तो यह समझिए एक चैकी खाली पड़ी है। अगर वही कोई घटना घटती है तो आसपास के जनपदों से पुलिस बल मंगाना पड़ता है पुलिस कर्मियों का सीधा संपर्क नागरिकों से होता है। पुलिसकर्मी सबसे ज्यादा तनाव में रहता है और गाज भी उसी पर गिरती है लिहाजा पुलिसकर्मी के सुधार और और १ दिन की छुट्टी पर भी सरकार को गंभीरता से मंथन की जरूरत है। जब दफ्तर में पुलिस अधिकारियों का जमघट होगा और फ्लोवर नहीं होगा तो इंस्पेक्टर क्या करेंगे। नए थानों का निर्माण और आवास अच्छा विकल्प पर बीट कांस्टेबल सिस्टम की शुरुआत भी होनी चाहिए सभी कानून व्यवस्था में आमूल परिवर्तन देखने को मिलेगा पुलिस के मनोबल और चैकी में सिपाहियों की संख्या बचाए रखने के लिए माननीय को अलग से पैकेज टीम बनाएं उनको वहीं तक सीमित रखा जाए। कानून की लाचार अवस्था को संभालने के लिए बदलाव जरूरी है था लेकिन बदलाव निचले स्तर पर होना चाहिए। सूबे के पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह का कहना है कि पूरे देश में २० फ़ीसदी युक्तियां आज भी है सूबे में डेढ़ लाख पुलिस कर्मियों के पद खाली पड़े हैं पुलिस कर्मियों की कमी से पुलिसकर्मी खुद को कुंठाग्रस्त महसूस करता है आज सूबे के थानेदार जब एसी में आना पसंद करते हैं तो कानून व्यवस्था खुद-ब-खुद अपाहिज हो जाती है। ग्रामीण अंचलों में कानून व्यवस्था का दारोमदार निचले स्तर के पुलिसिंग तक सीमित हो चुकी है। सपा प्रवक्ता सुनील सिंह साजन के अनुसार किसी भी बीमारी के लिए कोई दवाई बनती है तो पहले सीमित दायरे में प्रयोग की जाती है एक साथ सूबे में लागू होने पर थानों में वर्चस्व का एनकाउंटर जैसा माहौल देखने की आशंका बलवती हो जाती है कांग्रेस प्रवक्ता अशोक सिंह का मानना है कि सूबे की जनता ने सत्ता को पुलिसिया प्रयोगशाला बनाने के लिए सत्ता नहीं सौंपी थी सत्ता सदैव सरकार के एक बाल से चलती है। भाजपा पूर्व प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत बाजपेई का कहना है कि जल्दबाजी में लिया गया सरकार का फैसला से थानों में वर्चस्व को लेकर जूता में दाल बांटने के लिए जूता पैजामा का नजारा भी साइड इफेक्ट की तरह दिखना शुरू हो सकता है आला अधिकारियों की गुटबंदी हमसे सरकार का फार्मूला बैक टायर भी कर सकता है फिलहाल तो पुलिस व्यवस्था में बदलाव की लहर दौड़ पड़ी है।


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