• मुकेश कुमार रिषीवर्मा

हमेशा स्वस्थ संदेश वाली फिल्में देखें : संजय आर. निषाद


पिछले दिनों बनारस में हिंदी फीचर फिल्म - शूद्र ए लव स्टोरी की शूटिंग के दौरान फिल्म निर्देशक संजय आर निषाद से उनके संघर्षमय व प्रेरणादायी जीवन के सम्बन्ध में मेरी बातचीत हुई, तब उन्होंने अपने जीवन के निजी पहलुओं का खुलासा किया | उन्होंने अपने जीवन की संघर्षमयी पुस्तक मेरे सामने खोलकर रख दी | कहते हैं सफलता यों ही रास्ते में पड़ी फोकट में नहीं मिल जाती | इसे पाने के लिए दिनरात एक करना पड़ता है, कुर्बानियों पर कुर्बानियां देनी पड़ती हैं, बडे-बडे इम्तहान पास करने पड़ते हैं | तिरस्कार- अपमान न जाने क्या-क्या पचाना पडता है, तब जाकर सोना कुन्दन बनता है -

मुकेश :- सर! आपने अपने फिल्मी केरिअर की शुरुआत कब की थी ? संजय :- जी, हमने 2006-07 में भोजपुरी सिनेमा में सहायक निर्देशक की हैसियत से काम करना शुरू किया था | मुकेश :- अच्छा सर ! आपके फिल्मी गुरू कौन रहे, जिन्होंने आपका सही मार्गदर्शन किया हो ? संजय :- देखिए... वैसे तो हमारे काफी गुरू रहे और समयानुसार बदलते रहे पर सच्चे गुरू तो रमाकांत प्रसाद जी ही रहे और हमेशा रहेंगे | मुकेश :- क्या आपका कोई परिवारीजन पहले से ही फिल्म इंडस्ट्री से जुड़ा था ? संजय :- नहीं ! बिल्कुल नहीं... दूर-दूर तक मेरे परिवार तो क्या रिस्तेदारों तक का फिल्म जगत से कोई नाता नहीं था | जो भी सीखा फिल्म जगत में घुसकर सीखा... | मुकेश :- आपका करीब 11-12 साल पुराना फिल्म जगत में निर्देशन का अनुभव है | इसबीच की अपनी खट्टी-मीठी यादों को शेअर करना चाहेंगे ? संजय :- देखिए... मुकेशजी ! ये जो फिल्म जगत है न, दूर से देखने में बडा आकर्षक लगता है, पर हकीकत में ये दलदल है | इसमें पगपग पर धोखेबाज़, कमीनेटाईप के लोगों से सामना करना होता है | अगर आप कमजोर पड गये या अनुभवहीन हो तो दलदल से निकलना बहुत मुश्किल है | अपना सर्वस्व लुटाकर ही बाहर निकला जा सकता है | स्वयं मेरे साथ कितने लोगों ने झोल किया | पगपग पर धोखा मिला, काम करने का मेहनताना तो छोडिये नाम तक खा गये लोग | मुकेश :- क्या ऐसा भी होता है फिल्म जगत में...? संजय :- अरे मुकेशजी ! अपवाद को छोड दें तो कमीने ही कमीने भरे पड़े हैं | हम जिस परिवार से आये हैं वो कोई सुविधा - सम्पन्न परिवार नहीं था | अपने पीछे कोई गॉडफादर नहीं था | इसलिए संघर्ष तो करना ही था | मैं टूटा नहीं, किसी के सामने झुका नहीं बस अपना काम करता रहा... नाम के पीछे कभी नहीं भागा | मुकेश :- बिल्कुल सर ! आखिर जीवन का दूसरा नाम भी तो संघर्ष है | पिछले वर्ष आप हिंदी फीचर फिल्म - पहल से काफी चर्चा में रहे, इसके सम्बन्ध में कुछ बताईये ? संजय :- हाँ जी, यह एक सामाजिक फिल्म है, इसके गाने व प्रोमो रिलीज हो चुके हैं | किन्हीं कारणों से फिल्म के प्रदर्शन में देरी हो रही है | मुकेश :- जीसर... और आपकी यह फिल्म (शूद्र अ लव स्टोरी) भी लगभग पूरी हो चुकी है, इससे आपको क्या उम्मीदें हैं ? संजय :- शूद्र ए लव स्टोरी मेरी अब तक की सबसे सर्वश्रेष्ठ निर्देशित फिल्म है | इसकी कहानी जबरदस्त है | मुकेश :- आगे आप कौन सी फिल्म का निर्देशन करने जा रहे हैं ? संजय :- है एक हिंदी फीचर फिल्म, जिसके नाम का खुलासा मैं अभी नहीं कर सकता, क्योंकि उसकी पटकथा पर काम चल रहा है | मुकेश :- चलते - चलते आप अपने दर्शकों को कोई संदेश देना चाहेंगे ? संजय :- जी जरूर... हमेशा स्वस्थ संदेश वाली फिल्में ही देखें, ऐसी फिल्में देखें जो नि:शकोच पूरे परिवार के साथ बैठकर देखी जा सकें | नमस्कार...!


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