• लेखक पंकज कुमार मिश्र

कविता -- सियासती धर्म


हर मजहबी अकराम अब छपते अखबारों में, सियासत शामिल होता है , अबके त्योहारों मे, खुशगर्दी किसको कितनी है , ये बात पता करना हो गर कर लो खुद को कामयाब, चंद पशेमन यारों मे , हर मजहबी................. सियासत शामिल........

पत्थर चलते है सरहद पर गोले हथगोले भी कौमी समता है छिन्न-भिन्न नेता बड़बोले भी वो हाथ धड़े से अलग करो जिसमें इस देश का खूँ नही ऐसे मुजाहिद बस शामिल हो , वतनी गद्दारो में , हर मजहबी .............. सियासत शामिल.......

" पंकज " अविराम दहाड़ उठे , नर एक नही जलने पाये , सत्ता के मतवालो की लोलुपता, बिल्कुल ना चलने पाये , ऐसे निकृष्ट विचारो का ना, पालन हो परिवारों में , हर मजहबी अकराम अब छपते अखबारों मे , सियासत शामिल .........


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