• लेखिका कुसुम सिंह

दिखावा तो नही..


लडती है वह रोज किसी और से नही, अपने आप से...

बढती है वह रोज दूसरों से आगे नही, अपने कल से.... रखती है वह उम्मीद किसी और से नही, अपने आज से....

करती है खुश रहने की कोशिश गलत रास्तों से नही, गलत को सही करके....

चिढ़ती है वह बहुत रिश्ते नातों से नही, रिश्तों में होती साजिशों से....

लोग कहते हैं बदल गयी है वह ऐसा भी नही कि कदर नही है, पर जो है उसमें दिखावा भी नही है....

ऐसा रूप देख के बहुतों ने रास्ते भी बदल लिए हैं, पर जो बचे हैं पीछे खींचने वाले भी नही हैं.....

जिम्मेदारियां निभाते निभाते लगता जैसे हाथ खाली हैं, पर नही निभाने का अफसोस भी नही है.....

पता नहीं कहां पहुचेगी वह ऐसा नही कि मंजिल पता नही है, पर मेहनत न करने का मलाल भी नही है....


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