• लेखक मुकेश कुमार ऋषिवर्मा

आजादी...


कहने को तो हम 1947 में आजाद हो गये पर यह आजादी आज भी आधी अधूरी है क्योंकि, आज भी हम बटे हुए हैं - धर्म-जाति, उपजाति, भाषा-प्रांत की खोखली मानसिकता में बात-बात पर मर कट जाते हैं जाति-धर्म का रौब दिखाते हैं | दुनिया चाँद-तारों तक पहुँच गई और हम सिर्फ बिल्ली के रास्ता काटने पर ही सिर पकड़ कर बैठ जाते हैं हमें फिर एक जंग लडनी होगी और वास्तविक आजादी लेनी होगी ||


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